महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित श्रीगणेशकव्यष्टकम् (गणेश स्तवन), ब्रह्मपुराण के अंतर्गत गणेश जी की स्तुति है, यह आठ श्लोकों का एक स्तोत्र है, ९वें श्लोक में इसकी फलश्रुति है। यह स्तोत्र का पाठ करने से रचनात्मक शक्ति (कवित्व) का विकास होता है, साथ ही ज्ञान एवं बुद्धि की प्राप्त होती है।

🙏 श्री गणेश स्तवन 🙏
चतुःषष्टिकोट्याख्यविद्याप्रदं त्वां सुराचार्यविद्याप्रदानाप्रदानम्।
कठाभीष्टविद्यार्पकं दन्तयुग्मं कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि ॥ १ ॥
गणेश्वर! आप चौंसठ कोटि विद्याओंके दाता तथा देवताओंके आचार्य बृहस्पतिको भी विद्या-प्रदानका कार्य पूर्ण करनेवाले हैं। कठको अभीष्ट विद्या देनेवाले भी आप ही हैं। (अथवा आप कठोपनिषद्रूपा अभीष्ट विद्याके दाता हैं।) आप द्विरद हैं, कवि हैं और कवियोंकी बुद्धिके स्वामी हैं; मैं आपको प्रणाम करता हूँ।
स्वनाथं प्रधानं महाविघ्ननाथं निजेच्छाविसृष्टाण्डवृन्देशनाथम्।
प्रभुं दक्षिणास्यस्य विद्याप्रदं त्वां कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि ॥ २ ॥
आप ही अपने स्वामी एवं प्रधान हैं। बड़े-बड़े विघ्नोंके नाथ हैं। स्वेच्छासे रचित ब्रह्माण्डसमूहके स्वामी और रक्षक भी आप ही हैं। आप दक्षिणास्यके प्रभु एवं विद्यादाता हैं। आप कवि हैं एवं कवियोंके लिये बुद्धिनाथ हैं; मैं आपको प्रणाम करता हूँ।
विभो व्यासशिष्यादिविद्याविशिष्टप्रियानेकविद्याप्रदातारमाद्यम्।
महाशाक्तदीक्षागुरुं श्रेष्ठदं त्वां कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि ॥ ३ ॥
विभो! आप व्यास-शिष्य आदि विद्याविशिष्ट प्रियजनोंको अनेक विद्या प्रदान करनेवाले और सबके आदि पुरुष हैं। महाशाक्त-मन्त्रकी दीक्षाके गुरु एवं श्रेष्ठ वस्तु प्रदान करनेवाले आप कवि एवं कवियोंके बुद्धिनाथको मैं प्रणाम करता हूँ।
विधात्रे त्रयीमुख्यवेदांश्च योगं महाविष्णवे चागमान् शङ्कराय।
दिशन्तं च सूर्याय विद्यारहस्यं कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि ॥ ४ ॥
जो विधाता (ब्रह्माजी)-को ‘वेदत्रयी’ के नामसे प्रसिद्ध मुख्य वेदोंका, महाविष्णुको योगका, शंकरको आगमोंका और सूर्यदेवको विद्याके रहस्यका उपदेश देते हैं, उन कवियोंके बुद्धिनाथ एवं कवि गणेशजीको मैं नमस्कार करता हूँ।
महाबुद्धिपुत्राय चैकं पुराणं दिशन्तं गजास्यस्य माहात्म्ययुक्तम्।
निजज्ञानशक्त्या समेतं पुराणं कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि ॥ ५ ॥
महाबुद्धि-देवीके पुत्रके प्रति गजाननके माहात्म्यसे युक्त तथा निज ज्ञानशक्तिसे सम्पन्न एक पुराणका उपदेश देनेवाले गणेशको, जो कवि एवं कवियोंके बुद्धिनाथ हैं, मैं प्रणाम करता हूँ।
त्रयीशीर्षसारं रुचानेकमारीं रमाबुद्धिदारं परं ब्रह्मपारम्।
सुरस्तोमकायं गणौघाधिनाथं कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि ॥ ६ ॥
जो वेदान्तके सारतत्त्व, अपने तेजसे अनेक असुरोंका संहार करनेवाले, सिद्धि-लक्ष्मी एवं बुद्धिको दाराके रूपमें अंगीकार करनेवाले और परात्पर ब्रह्मस्वरूप हैं; देवताओंका समुदाय जिनका शरीर है तथा जो गण-समुदायके अधीश्वर हैं, उन कवि एवं कवियोंके बुद्धिनाथ गणेशको मैं नमस्कार करता हूँ।
इसका पाठ भी करें👉 श्री गणेश प्रातः स्मरण स्तोत्र
चिदानन्दरूपं मुनिध्येयरूपं गुणातीतमीशं सुरेशं गणेशम्।
धरानन्दलोकादिवासप्रियं त्वां कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि ॥ ७ ॥
जो ज्ञानानन्दस्वरूप, मुनियोंके ध्येय तथा गुणातीत हैं; धरा एवं स्वानन्दलोक आदिका निवास जिन्हें प्रिय है; उन ईश्वर, सुरेश्वर, कवि तथा कवियोंके बुद्धिनाथ गणेशको मैं प्रणाम करता हूँ।
अनेकप्रतारं सुरक्ताब्जहारं परं निर्गुणं विश्वसद्ब्रह्मरूपम्।
महावाक्यसंदोहतात्पर्यमूर्तिं कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि ॥ ८ ॥
इसका पाठ भी करें👉 महालक्ष्मी अष्टक स्तोत्र
जो अनेकानेक भक्तजनोंको भव-सागरसे पार करनेवाले हैं; लाल कमलके फूलोंका हार धारण करते हैं; परम निर्गुण हैं; विश्वात्मक सद्ब्रह्म जिनका रूप है; ‘तत्त्वमसि’ आदि महावाक्योंके समूहका तात्पर्य जिनका श्रीविग्रह है, उन कवि एवं कवियोंके बुद्धिनाथ गणेशको मैं नमस्कार करता हूँ।
इदं ये तु काव्यष्टकं भक्तियुक्तास्त्रिसन्ध्यं पठन्ते गजास्यं स्मरन्तः।
कवित्वं सुवाक्यार्थमत्यद्भुतं ते लभन्ते प्रसादाद् गणेशस्य मुक्तिम् ॥ ९ ॥
जो भक्ति-भावसे युक्त हो तीनों संध्याओंके समय गजाननका स्मरण करते हुए इस ‘काव्यष्टक’ का पाठ करते हैं, वे गणेशजीके कृपा-प्रसादसे कवित्व, सुन्दर एवं अद्भुत वाक्यार्थ तथा मानव-जीवनके चरम लक्ष्य मोक्षको प्राप्त कर लेते हैं।
॥इति श्री वाल्मीकि कृत श्रीगणेश स्तोत्र संपूर्णम्॥




