गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र (Gajendra Moksha Stotra) का वर्णन श्रीमद्भागवत पुराण के अष्टम स्कन्ध में मिलता है । इस स्कन्ध के द्वितीय अध्याय में ग्राह के साथ गजेन्द्र के युद्ध का वर्णन है, तृतीय अध्याय में गजेन्द्र द्वारा श्री भगवान के स्तवन और गजेन्द्र मोक्ष का प्रसंग है और चतुर्थ अध्याय में गज-ग्राह के पूर्वजन्म का इतिहास है।
श्रीमद्भागवत में गजेन्द्रमोक्ष (Gajendra Moksha Stotra) के पाठ का माहात्म्य बतलाते हुए इसको स्वर्ग तथा यश प्रदान करने वाला, कलियुग के समस्त पापोंका नाश करने वाला, दुःस्वप्न का नाश करने वाला और कल्याणकारी कहा गया है।
महामना श्री मालवीयजी कहा करते थे कि गजेन्द्रकृत इस स्तवन (Gajendra Moksha Stotra) का आर्त्तभावसे पाठ करने पर लौकिक-पारमार्थिक महान् संकटों और विघ्नों से छुटकारा मिल जाता है और निष्काम भाव होनेपर अज्ञान के बन्धन से छूटकर पुरुष भगवान्को प्राप्त हो जाता है।
स्वयं भगवान का वचन है कि ‘जो रात्रिके शेषमें (ब्रह्ममुहूर्तके प्रारम्भ में) जागकर इस स्तोत्र के द्वारा मेरा स्तवन करते हैं, उन्हें मैं मृत्युके समय निर्मल मति (अपनी स्मृति) प्रदान करता हूँ।’ और ‘अन्ते मतिः सा गतिः’ के अनुसार उसे निश्चय ही परम पद की प्राप्ति हो जाती है तथा इस प्रकार वह सदा के लिये जन्म-मृत्यु के बन्धन से छूट जाता है।
गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र का पाठ (Gajendra Moksha Stotra)
श्री शुक उवाच –
एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनो हृदि ।
जजाप परमं जाप्यं प्राग्जन्मन्यनुशिक्षितम ॥१॥
भावार्थ : श्री शुकदेव जी ने कहा – परीक्षित ! बुद्धि के द्वारा पिछले अध्याय में वर्णन की गई विधि से निश्चय करके तथा मन को हृदय में एकाग्र करके, वह गजेन्द्र अपने पूर्व जन्म में सीखे हुए सर्वश्रेष्ठ स्तोत्र के जप द्वारा भगवान की स्तुति करने लगा ॥१॥

गजेन्द्र उवाच –
ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम्।
पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि॥ २ ॥
भावार्थ : गजेन्द्र ने कहा जो जगत्के मूल कारण हैं और सबके हृदय में पुरुष के रूपमें विराजमान हैं एवं समस्त जगत्के एकमात्र स्वामी हैं, जिनके कारण ये जड शरीर और मन आदि भी चेतन बन जाते हैं, उन सर्वसमर्थ परमेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ ।। 2 ।।
यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयम्।
योऽस्मात्परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम्॥ ३ ॥
भावार्थ : जिनके सहारे यह विश्व टिका है, जिनसे यह उत्पन्न हुआ है, जिन्होंने इसकी रचना की है और जो स्वयं ही इसके रूपमें प्रकट हो रहे हैं—फिर भी जो इस दृश्य जगत्से एवं उसकी कारणभूता प्रकृतिसे सर्वथा परे (विलक्षण) एवं श्रेष्ठ हैं—उन अपने-आप—बिना किसी कारण के—बने हुए भगवान्की मैं शरण लेता हूँ॥ ३ ॥
यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितं
क्वचिद्विभातं क्व च तत्तिरोहितम्।
अविद्धदृक् साक्ष्यभयं तदीक्षते
स आत्ममूलोऽवतु मां परात्परः॥ ४ ॥
भावार्थ : यह विश्वप्रपंच उन्हीं की माया से उनमें दिख रहा है। यह कभी प्रतीत होता है, तो कभी नहीं। परन्तु उनकी दृष्टि ज्यों-की-त्यों, एक-सी रहती हैं। वे इसके साक्षी हैं और उन दोनों को ही देखते रहते हैं। वे सबके मूल हैं और अपने मूल भी वही हैं। कोई दूसरा उनका कारण नहीं है। वे ही सबसे परे प्रभु मेरी रक्षा करें।। 4 ।।
कालेन पंचत्वमितेषु कृत्स्नशो
लोकेषु पालेषु च सर्व हेतुषु ।
तमस्तदाऽऽऽसीद गहनं गभीरं
यस्तस्य पारेsभिविराजते विभुः ॥५॥
भावार्थ : प्रलयके समय लोक, लोकपाल और इन सबके कारण सम्पूर्ण रूप से नष्ट हो जाते हैं। उस समय केवल अत्यन्त घना और गहरा अन्धकार-ही-अन्धकार रहता है। परन्तु अनन्त परमात्मा उससे सर्वथा परे विराजमान रहते हैं। वे ही प्रभु मेरी रक्षा करें ।। ५ ।।
न यस्य देवा ऋषयः पदं विदु-
र्जन्तुः पुनः कोsर्हति गन्तुमीरितुम ।
यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतो
दुरत्ययानुक्रमणः स मावतु ॥६॥
भावार्थ : उनकी लीलाओंका रहस्य जानना बहुत ही कठिन है। वे नटकी भाँति अनेकों वेष धारण करते हैं। उनके वास्तविक स्वरूपको न तो देवता जानते हैं और न ऋषि ही; फिर दूसरा ऐसा कौन प्राणी है जो वहाँ तक जा सके और उसका वर्णन कर सके? वे प्रभु मेरी रक्षा करें ।। ६ ।।
इस स्तोत्र का भी पाठ करें – जटायु कृत श्रीरामस्तोत्रम्
दिदृक्षवो यस्य पदं सुमंगलम
विमुक्त संगा मुनयः सुसाधवः ।
चरन्त्यलोकव्रतमव्रणं वने
भूतात्मभूता सुहृदः स मे गतिः ॥७॥
भावार्थ : जिनके परम मंगलमय स्वरूपका दर्शन करनेके लिये महात्मागण संसार की समस्त आसक्तियों का परित्याग कर देते हैं और वनमें जाकर अखण्ड भाव से अलौकिक व्रतोंका पालन करते हैं तथा अपने आत्माओं सबसे हृदयमें विराजमान देखकर स्वाभाविक ही सबकी भलाई करते हैं वे ही मुनियों के इष्ट भगवान् मेरे सहायक और मेरी गति हैं ।। ७ ।।
न विद्यते यस्य न जन्म कर्म वा
न नाम रूपे गुणदोष एव वा ।
तथापि लोकाप्ययसम्भवाय यः
स्वमायया तान्यनुकालमृच्छति ॥८॥
भावार्थ : न उनके जन्म-कर्म हैं और न-रूप; फिर गुण और दोष कैसे हो सकते हैं? फिर भी विश्वकी सृष्टि और संहार करनेके लिये समय-समयपर वे उन नाम-रूप-गुण-दोष-जन्म-कर्म आदि को अपनी मायासे स्वीकार करते हैं ।। 8 ।।
तस्मै नमः परेशाय ब्रह्मणेsनन्तशक्तये ।
अरूपायोरुरूपाय नम आश्चर्य कर्मणे ॥९॥
भावार्थ : उन्हीं अनन्त शक्तिमान् सर्वैश्वर्यमय परब्रह्म परमात्माको मैं नमस्कार करता हूँ। वे अरूप होनेपर भी बहुरूप हैं। मैं उन आश्चर्य कर्म करनेवाले के चरणोंमें नमस्कार करता हूँ ।। ९ ।।
नम आत्म प्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने ।
नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि ॥१०॥
भावार्थ : स्वयंप्रकाश, (जिसको देखने के लिए किसी और साधन की जरूरत न पड़े, जो आत्मप्रदीप है, जैसे दीपक को देखने के लिए किसी दूसरे प्रकाश की जरूरत नहीं है।) सबके साक्षी परमात्माको मैं नमस्कार करता हूँ। जो मन, वाणी और चित्तसे अत्यन्त दूर भी हैं उन परमात्माको मैं नमस्कार करता हूँ ।। 10 ।।
सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्चिता ।
नमः कैवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे ॥११॥
भावार्थ : विवेकी पुरुष, जिनका अन्तःकरण शुद्ध हो चुका है, वे निष्कर्मताके द्वारा जिन्हें प्राप्त करते हैं, वैसे कैवल्यके नाथ, निर्वाण सुख और ज्ञानस्वरूप परमात्माको मैं नमस्कार करता हूँ ।। 11 ।।
नमः शान्ताय घोराय मूढाय गुण धर्मिणे ।
निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च ॥१२॥
भावार्थ : जो सत्त्व, रज, तम इन तीन गुणोंका धर्म स्वीकार करके क्रमशः शान्त, घोर और मूढ़ अवस्था भी धारणा करते हैं, उन भेदरहित समभावसे स्थित एवं ज्ञानघन प्रभुको मैं बार-बार नमस्कार करता हूँ ।। 12 ।।
इस स्तोत्र का भी पाठ करें – महालक्ष्मी अष्टक स्तोत्र
क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे ।
पुरुषायात्ममूलाय मूलप्रकृतये नमः ॥१३॥
भावार्थ : सभी क्षेत्रोंके ज्ञाता को नमस्कार है जो सबके अध्यक्ष (स्वामी) हैं और सभी के साक्षी हैं, जो अपने आपके भी मूल पुरुष हैं और मूल प्रकृति हैं उनको नमस्कार है ।। 13 ।।
सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे सर्वप्रत्ययहेतवे ।
असताच्छाययोक्ताय सदाभासाय ते नमः ॥१४॥
भावार्थ : जो सभी इन्द्रियों और उसके गुणों के द्रष्टा हैं, मनमें चलने वाले सभी विचारों के कारण हैं, जो नहीं है और जो है उन दोनों के द्वारा आपका ही पता चलता है। ऐसे आपको नमस्कार है ।। 14 ।।
नमो नमस्तेsखिल कारणाय
निष्कारणायाद्भुत कारणाय ।
सर्वागमान्मायमहार्णवाय
नमोपवर्गाय परायणाय ॥१५॥
भावार्थ : सभी के कारण रूप और बिना किसी कारण के और अद्भुत कारण रूप वाले आपको नमस्कार है। जैसे सभी नदी-झरने महा समुद्र की ओर ही जाते हैं उसी तरह समस्त वेद-शास्त्र आपकी ओर ही जाते हैं। ऐसे मोक्ष स्वरूप आपको नमस्कार है ।। 15 ।।
गुणारणिच्छन्न चिदूष्मपाय
तत्क्षोभविस्फूर्जित मानसाय ।
नैष्कर्म्यभावेन विवर्जितागम-
स्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि ॥१६॥
भावार्थ : जैसे काष्ठमें अग्नि गुप्त रहती है वैसे ही आप अपनेको गुणोंसे ढक कर रखते हैं। गुणोंमें क्षोभ होने पर मन द्वारा विविध प्रकारकी सृष्टि रचनाका संकल्प करते हैं। जो लोग नैष्कर्म्यता (कर्म त्याग) आदि द्वारा वेद शास्त्रोंसे से ऊपर उठ जाते हैं उनके आत्माके रूपमें आप स्वयं ही प्रकाशित हो जाते हैं। आपको मैं नमस्कार करता हूँ ।। 16 ।।
मादृक्प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणाय
मुक्ताय भूरिकरुणाय नमोsलयाय ।
स्वांशेन सर्वतनुभृन्मनसि प्रतीत-
प्रत्यग्दृशे भगवते बृहते नमस्ते ॥१७॥
भावार्थ : मेरे जैसे शरणागत पशुके बंधनको काटने वाले नित्य मुक्त प्रचुर करुणा वाले, आलस्य रहित आपको नमस्कार है। आप अपने ही अंशसे सभी देह धारियोंके मनमें प्रतीत होते हैं ऐसे विस्तृत (अनन्त) भगवान आपको नमस्कार है ।। 17 ।।
आत्मात्मजाप्तगृहवित्तजनेषु सक्तै-
र्दुष्प्रापणाय गुणसंगविवर्जिताय ।
मुक्तात्मभिः स्वहृदये परिभाविताय
ज्ञानात्मने भगवते नम ईश्वराय ॥१८॥
भावार्थ : जो लोग शरीर, पुत्र, गुरुजन, गृह, सम्पत्ति और स्वजनोंमें आसक्त हैं- उन्हें आपकी प्राप्ति अत्यन्त कठिन है। क्योंकि आप स्वयं गुणोंकी आसक्तिसे रहित हैं। जीवन्मुक्त पुरुष अपने हृदयमें आपका निरन्तर चिन्तन करते रहते हैं। उन ईश्वरको, ज्ञानस्वरूप भगवान्को मैं नमस्कार करता हूँ ।। 18 ।।
इस स्तोत्र का भी पाठ करें – विभीषण कृत श्री हनुमान स्तोत्र
यं धर्मकामार्थविमुक्तिकामा
भजन्त इष्टां गतिमाप्नुवन्ति ।
किं त्वाशिषो रात्यपि देहमव्ययं
करोतु मेsदभ्रदयो विमोक्षणम् ॥१९॥
भावार्थ : धर्म, अर्थ काम और मोक्षकी कामनासे मनुष्य जिनका भजन करके अपनी अभीष्ट वस्तु प्राप्त कर लेते हैं। इतना ही नहीं, वे उन भक्तोंको सभी प्रकारका सुख देते हैं और अपने ही जैसे अविनाशी पार्षद शरीर भी देते हैं। वे ही परम दयालु प्रभु मेरा उद्धार करें ।। 19 ।।
एकान्तिनो यस्य न कंचनार्थ
वांछन्ति ये वै भगवत्प्रपन्नाः ।
अत्यद्भुतं तच्चरितं सुमंगलं
गायन्त आनन्द समुद्रमग्नाः ॥२०॥
भावार्थ : जिनके भक्तजन एकान्त होकर, उनकी शरणमें जाकर कुछ भी इच्छा न रखते हुए भगवान की अद्भुत और मंगलमय चरित्र का गायन करते हुए आनन्दके समुद्रमें मग्न रहते हैं (उनकी मैं स्तुति करता हूँ) ।। 20 ।।
तमक्षरं ब्रह्म परं परेश-
मव्यक्तमाध्यात्मिकयोगगम्यम ।
अतीन्द्रियं सूक्ष्ममिवातिदूर-
मनन्तमाद्यं परिपूर्णमीडे ॥२१॥
भावार्थ : उन अविनाशी, सर्वव्यापक, सर्वश्रेष्ठ, ब्रह्मादिके भी नियामक, अभक्तोंके लिये अप्रकट होनेपर भी भक्तियोगद्वारा प्राप्त करनेयोग्य, अत्यन्त निकट होनेपर भी मायाके आवरणके कारण अत्यन्त दूर प्रतीत होनेवाले, इन्द्रियोंके द्वारा अगम्य तथा अत्यन्त दुर्विज्ञेय, अन्तरहित किंतु सबके आदिकारण एवं सब ओरसे परिपूर्ण उन भगवान्की मैं स्तुति करता हूँ॥ २१ ॥
यस्य ब्रह्मादयो देवा वेदा लोकाश्चराचराः ।
नामरूपविभेदेन फल्ग्व्या च कलया कृताः ॥२२॥
भावार्थ : ब्रह्मादि समस्त देवता, चारों वेद तथा सम्पूर्ण चराचर जीव नाम और आकृतिके भेदसे जिनके अत्यन्त क्षुद्र अंशके द्वारा रचे गये हैं॥ २२ ॥
यथार्चिषोsग्नेः सवितुर्गभस्तयो
निर्यान्ति संयान्त्यसकृत् स्वरोचिषः ।
तथा यतोsयं गुणसंप्रवाहो
बुद्धिर्मनः खानि शरीरसर्गाः ॥२३॥
भावार्थ : जिस प्रकार प्रज्वलित अग्निसे लपटें तथा सूर्यसे किरणें बार-बार निकलती हैं और पुनः अपने कारणमें लीन हो जाती हैं, उसी प्रकार बुद्धि, मन, इन्द्रियाँ और नाना योनियोंके शरीर—यह गुणमय प्रपंच जिन स्वयंप्रकाश परमात्मासे प्रकट होता है और पुनः उन्हींमें लीन हो जाता है॥ २३ ॥
स वै न देवासुरमर्त्यतिर्यङ्
न स्त्री न षण्ढो न पुमान् न जन्तुः ।
नायं गुणः कर्म न सन्न् चासन्
निषेधशेषो जयतादशेषः ॥ २४ ॥
भावार्थ : वे भगवान् वास्तवमें न तो देवता हैं न असुर, न मनुष्य हैं न तिर्यक् (मनुष्यसे नीची—पशु, पक्षी आदि किसी) योनिके प्राणी हैं। न वे स्त्री हैं न पुरुष और न नपुंसक ही हैं। न वे ऐसे कोई जीव हैं, जिनका इन तीनों ही श्रेणियोंमें समावेश न हो सके। न वे गुण हैं न कर्म, न कार्य हैं न तो कारण ही। सबका निषेध हो जानेपर जो कुछ बच रहता है, वही उनका स्वरूप है और वे ही सब कुछ हैं। ऐसे भगवान् मेरे उद्धारके लिये आविर्भूत हों ॥ २४ ॥
जिजीविषे नाहमिहामुया कि-
मन्तर्बहिश्चावृतयेभयोन्या ।
इच्छामि कालेन न यस्य विप्लव-
स्तस्यात्मलोकावरणस्य मोक्षम ॥२५॥
भावार्थ : मैं इस ग्राहके चंगुलसे छूटकर जीवित रहना नहीं चाहता; क्योंकि भीतर और बाहर—सब ओरसे अज्ञानके द्वारा ढके हुए इस हाथीके शरीरसे मुझे क्या लेना है। मैं तो आत्माके प्रकाशको ढक देनेवाले उस अज्ञानकी निवृत्ति चाहता हूँ, जिसका कालक्रमसे अपने-आप नाश नहीं होता, अपितु भगवान्की दयासे अथवा ज्ञानके उदयसे होता है ॥ २५ ॥
सोsहं विश्वसृजं विश्वमविश्वं विश्ववेदसम ।
विश्वात्मानमजं ब्रह्म प्रणतोsस्मि परं पदम् ॥२६॥
भावार्थ : इस प्रकार मोक्षका अभिलाषी मैं विश्वके रचयिता, स्वयं विश्वके रूपमें प्रकट तथा विश्वसे सर्वथा परे, विश्वको खिलौना बनाकर खेलनेवाले, विश्वमें आत्मारूपसे व्याप्त, अजन्मा, सर्वव्यापक एवं प्राप्तव्य वस्तुओंमें सर्वश्रेष्ठ श्रीभगवान्को केवल प्रणाम ही करता हूँ—उनकी शरणमें हूँ ॥ २६ ॥
इस स्तोत्र का भी पाठ करें – श्री सूक्त पाठ
योगरन्धित कर्माणो हृदि योगविभाविते ।
योगिनो यं प्रपश्यन्ति योगेशं तं नतोsस्म्यहम् ॥२७॥
भावार्थ : जिन्होंने भगवद्भक्तिरूप योगके द्वारा कर्मोंको जला डाला है, वे योगी लोग उसी योगके द्वारा शुद्ध किये हुए अपने हृदयमें जिन्हें प्रकट हुआ देखते हैं, उन योगेश्वरभगवान्को मैं नमस्कार करता हूँ ॥ २७ ॥
नमो नमस्तुभ्यमसह्यवेग-
शक्तित्रयायाखिलधीगुणाय ।
प्रपन्नपालाय दुरन्तशक्तये
कदिन्द्रियाणामनवाप्यवर्त्मने ॥२८॥
भावार्थ : जिनकी त्रिगुणात्मक (सत्त्व-रज-तमरूप) शक्तियोंका रागरूप वेग असह्य है, जो सम्पूर्ण इन्द्रियोंके विषयरूपमें प्रतीत हो रहे हैं, तथापि जिनकी इन्द्रियाँ विषयोंमें ही रची-पची रहती हैं—ऐसे लोगोंको जिनका मार्ग भी मिलना असम्भव है, उन शरणागतरक्षक एवं अपार शक्तिशाली आपको बार-बार नमस्कार है ॥ २८ ॥
नायं वेद स्वमात्मानं यच्छ्क्त्याहंधिया हतम् ।
तं दुरत्ययमाहात्म्यं भगवन्तमितोsस्म्यहम् ॥२९॥
भावार्थ : जिनकी अविद्या नामक शक्तिके कार्यरूप अहंकारसे ढके हुए अपने स्वरूपको यह जीव जान नहीं पाता, उन अपार महिमावाले भगवान्की मैं शरण आया हूँ ॥ २९ ॥
श्री शुकदेव उवाच –
एवं गजेन्द्रमुपवर्णितनिर्विशेषं
ब्रह्मादयो विविधलिंगभिदाभिमानाः ।
नैते यदोपससृपुर्निखिलात्मकत्वात
तत्राखिलामरमयो हरिराविरासीत् ॥३०॥
भावार्थ : श्रीशुकदेवजी कहते हैं—इस तरह गजेन्द्र द्वारा वर्णित निर्विशेष ईश्वर की स्तुति से ब्रह्मा आदि देवता उसकी रक्षा करनेके लिये नहीं आये। क्योंकि वे सब भिन्न-भिन्न नाम और रूपको अपना स्वरूप मानते हैं। उस समय सभीके आत्मा और सभी देवताओं के स्वरूप होनेके कारण स्वयं भगवान् श्रीहरि प्रकट हो गये ॥ ३० ॥
तं तद्वदार्त्तमुपलभ्य जगन्निवासः
स्तोत्रं निशम्य दिविजैः सह संस्तुवद्भि:।
छन्दोमयेन गरुडेन समुह्यमान –
श्चक्रायुधोsभ्यगमदाशु यतो गजेन्द्रः ॥३१॥
भावार्थ : उस गजेन्द्रको अत्यंत पीड़ित देखकर, उसकी स्तुति को सुनकर सम्पूर्ण जगत्में रहनेवाले विश्वके एकमात्र आधार भगवान् वेदमय गरुड़ पर बैठे हुए, चक्र आदि आयुध सहित, बड़ी शीघ्रता से वहाँ प्रगट हो गए। उनके साथ स्तुति करते हुए देवतागण भी आ गए ॥ ३१ ॥
सोsन्तस्सरस्युरुबलेन गृहीत आर्त्तो
दृष्ट्वा गरुत्मति हरिम् ख उपात्तचक्रम ।
उत्क्षिप्य साम्बुजकरं गिरमाह कृच्छा –
नारायणाखिलगुरो भगवन्नमस्ते ॥३२॥
भावार्थ : सरोवरके भीतर अत्यंत बलवान् ग्राहसे पकड़ा हुआ और व्याकुल हाथी ने देखा कि आकाशमें गरुड़ पर सवार भगवान् चक्रको उठाये हुए आ रहे हैं। उस हाथी ने सरोवरसे एक सुन्दर कमलके पुष्पको सूंडमें ऊपर उठाया और अत्यंत कष्टसे बोला-नारायण! अखिलगुरो! भगवन्! आपको नमस्कार है।। 32 ।
तं वीक्ष्य पीडितमजः सहसावतीर्य
सग्राहमाशु सरसः कृपयोज्जहार ।
ग्राहाद् विपाटितमुखादरिणा गजेन्द्रं
सम्पश्यतां हरिरमूमुच दुस्त्रियाणाम् ॥३३॥
भावार्थ : उसे पीड़ित देखकर अजन्मा श्रीहरि एकाएक गरुड़को छोड़कर नीचे झीलपर उतर आये। वे दयासे प्रेरित हो ग्राहसहित उस गजराजको तत्काल झीलसे बाहर निकाल आये और देवताओंके देखते-देखते चक्रसे उस ग्राहका मुँह चीरकर उसके चंगुलसे हाथीको उबार लिया ॥ ३३ ॥
गजेंद्र मोक्ष कथा (Gajendra Moksha Katha in Hindi)
गजेन्द्र मोक्ष (Gajendra Moksha) की कथा को शुकदेव जी एक आख्यायिका के रूप में सुनाते हैं। सामान्यतः पशुओं को भाषा व्यवहार करनेवाला नहीं माना जाता परंतु संस्कार रूप से गुण-दोष विद्यमान रहते हैं।
विशेष रूप से उपनिषद् आदि में कुछ पशु-पक्षियों को ज्ञान का अधिकारी ही नहीं ज्ञान का उपदेशक भी कहा गया है। अगर यह कथा सिर्फ कथा ही लगती है, तो भी गजेन्द्र स्तोत्र दिव्य भाव और ज्ञान से सम्पन्न है। यह स्तोत्र और उसकी कथा दोनों ही आदरणीय है।
गजेन्द्र मोक्ष (Gajendra Moksha) की आख्यायिका यह है कि द्रविड़ देश में एक पाण्ड्यवंशी राजा था। उसका नाम इन्द्रद्युम्न था। वह भगवान् का एक श्रेष्ठ उपासक एवं अत्यंत यशस्वी था।
एक बार राजा इन्द्रद्युम्न राजपाट को छोड़कर मलय पर्वत पर रहने लगे। उन्होंने जटाएँ बढ़ा ली, तपस्वी का वेश धारण कर लिया। एक दिन स्नान के बाद पूजाके समय मनको एकाग्र कर एवं मौनव्रती होकर वे सर्वशक्तिमान भगवान् की आराधना कर रहे थे।
उसी समय दैवयोग से परम यशस्वी अगस्त्य मुनि अपनी शिष्य मंडली के साथ वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने देखा कि यह राजा प्रजापालन और गृहस्थोचित अतिथिसेवा आदि धर्म का परित्याग करके तपस्वियों की तरह एकांतमे चुपचाप बैठकर उपासना कर रहा है। इसलिए वे राजा इन्द्रद्युम्न पर क्रोधित हो गए।
उन्होंने राजा को यह श्राप दिया इस राजा ने गुरुजनों से शिक्षा नहीं ग्रहण की है, अभिमानवश परोपकार से निवृत्त होकर यह मनमानी कर रहा है। यह हाथी के समान जड़बुद्धि है। इसलिए इसे वही घोर अज्ञानमयी हाथी की योनि प्राप्त हो।
शाप एवं वरदान देने में समर्थ अगस्त्य ऋषि इस प्रकार शाप देकर अपनी शिष्य मंडली के साथ वहां से चले गए। राजा इन्द्रद्युम्न ने यह समझकर संतोष किया कि यह मेरा प्रारब्ध ही था। इसके बाद आत्मा की विस्मृति करा देनेवाली हाथी की योनि उन्हें प्राप्त हुई।
उसी प्रकार “हूहू” नाम का एक गन्धर्व था। वह तरह तरह की चेष्टा से लोगों को हँसाया करता था। एक बार देवल ऋषि जल में स्नान कर तर्पण आदि कर करे थे। उस गन्धर्व ने जल में घुसकर उनका पैर पकड़ लिया मानो ग्राह हो। अचानक पैर पकड़े जाने से ऋषि चौंक पड़े। यह देखकर सभी हँस पड़े। ऋषि ने सारा खेल समझ लिया।
उन्होंने क्रुद्ध होकर श्राप दे दिया कि तुम ग्राह जैसा करते हो, अतः ग्राह हो जाओ। हूहू गन्धर्व उनसे क्षमा याचना करने लगा। शांत होकर ऋषि ने कहा कि ग्राह होकर भी इसी तरह से सबका पैर पकड़ते रहो। भगवान् की कृपा से ग्राह योनि से निकल जाओगे।
इधर राजा इन्द्रद्युम्न हाथी बन गया। त्रिकूट नामक एक प्रसिद्ध और श्रेष्ठ पर्वत था। उसी पर्वत के घोर जंगल में बहुत सी हथिनियों के साथ शापग्रस्त राजा हाथी के रूप में निवास करने लगा। वह बड़े बड़े शक्तिशाली हाथियों का सरदार था।
एक दिन वह गजेन्द्र, हथिनियों, अन्य हाथी और हाथी के छोटे छोटे बच्चों के साथ घूम रहा था। बड़े जोर की धूप थी, इसीलिए वह व्याकुल हो उठा। उसे तथा उसके साथियों को प्यास सताने लगी।
उस समय दूरसे ही कमल के परागसे सुवासित वायु की गंध सूंघकर वह उसी दिशा की ओर चल पड़ा। थोड़ी ही देर में वेग से चल कर वह सरोवर के तट पर जा पहुँचा। उसी सरोवर में “हूहू” गन्धर्व ग्राह के रूप में रह रहा था।
गजेन्द्र ने उस निर्मल और मधुर जल में घुसकर पहले तो अपनी सूँड से उठाकर जी भर जल पिया फिर उस जल में स्नान करके अपनी थकान मिटायी।
गजेन्द्र मोहग्रस्त होकर अपनी सूँड से जल की फुहारें छोड़ छोड़कर साथ की हथिनियों और बच्चों को नहलाने लगा। भगवान् की माया से मोहित हुआ गजेन्द्र उन्मत्त हो रहा था। उस बेचारे को इस बात का पता ही न था कि उसके सिरपर बहुत बड़ी विपत्ति मँडरा रही है।
गजेन्द्र जिस समय इतना उन्मत्त हो रहा था, उसी समय प्रारब्ध 1 की प्रेरणा से ग्राह ने उनका पैर पकड़ लिया। इस प्रकार एकाएक विपत्ति में पड़कर उस बलवान गजेन्द्र ने अपनी शक्ति के अनुसार अपने को छुड़ाने की बड़ी चेष्टा की, परन्तु छुड़ा न सका।
दूसरे हाथी, हथिनियाँ और गजेन्द्र की यह स्थिति देखकर घबड़ा गए और उन्होंने उसे सहायता पहुँचाने की कोशिश की, पर वे सभी असफल रहे।
गजेन्द्र और ग्राह अपनी अपनी पूरी शक्ति लगाकर भिड़े हुए थे। कभी गजेन्द्र ग्राह को बाहर खींच कर ले आता तो कभी ग्राह गजेन्द्र को भीतर खींच कर ले जाता।
अंत में बहुत समय तक खींचे जाने से गजेन्द्र का शरीर शिथिल पड़ गया। न तो उसके शरीर में बल रह गया और न मन में उत्साह। इधर ग्राह तो जलचर जीव ही ठहरा, इसीलिए उसकी शक्ति क्षीण होने के स्थान पर बढ़ गयी। वह बड़े उत्साह से और भी बल लगाकर गजेन्द्र को खींचने लगा।
इस प्रकार सर्वथा असमर्थ हो, प्राणसंकट में पड़ जाने से गजेन्द्र अपने छुटकारे का उपाय सोचने लगा। अंत में वह इस निश्चय पर पहुँचा कि यह ग्राह विधाता की फाँसी है। मेरे बराबर कई हाथी मिलकर भी मुझे नहीं छुड़ा सके। इसीलिए अब मैं संपूर्ण विश्व के एकमात्र आश्रय भगवान् की ही शरण लेता हूँ। यह काल बड़ा बली है। इससे भयभीत होकर जो कोई भगवान की शरण में जाता है, उसे वे प्रभु अवश्य बचा लेते हैं।
उनके भय से भयभीत होकर मृत्यु भी अपना काम ठीक ठीक पूरा करती है। वही प्रभु सबके आश्रय हैं। मैं उन्हीं की शरण में जाता हूँ। ऐसा विचार कर वह गजेन्द्र अपने पूर्वजन्म (राजा इन्द्रद्युम्न के) में सीखे हुए स्तोत्र से भगवान् की स्तुति करने लगा। वही स्तोत्र गजेन्द्र स्तुति (Gajendra Stuti) के नाम से प्रसिद्ध है।
इस स्तोत्र में गजेन्द्र ने बिना किसी भेदभाव के निर्विशेषरूप ईश्वर की स्तुति की थी, इसीलिए विभिन्न नाम रूपों को अपना मानने वाले ब्रह्मा आदि देवता उसकी रक्षा के लिए नहीं आये। उस समय सर्वात्मा होने के कारण सर्वदेवस्वरूप स्वयं भगवान् श्रीहरि प्रकट हो गए।
सरोवर के भीतर बलवान ग्राह ने गजेन्द्र को पकड़ रखा था और वह अत्यंत व्याकुल हो रहा था। जब उसने देखा कि श्रीहरि आ रहें हैं तब अपनी सूँड में तालाब से कमल का एक पुष्प उठाया और बड़े कष्ट से कहा हे नारायण! अखिल गुरु! भगवन्! आपको नमस्कार है।
भगवान् ने जब देखा कि गजेन्द्र अत्यंत पीड़ित हो रहा है तो उन्होंने शीघ्रता से गजेन्द्र और ग्राह को सरोवर से बाहर निकाल लिया और ग्राह का मुंह फाड़ कर गजेन्द्र को छुड़ा लिया। वह ग्राह तुरंत ही दिव्य शरीर संपन्न हो गया। गजेन्द्र भी भगवान् के स्पर्श से अज्ञान के बंधन से मुक्त हो गया। उसने भगवान् का ही रूप प्राप्त कर लिया।
यह गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र वेदांत का स्पर्श करता है। सामान्यतः हम यही समझते हैं कि जब हम प्रार्थना करते हैं तो बादलों के ऊपर रहने वाला कोई एक देवता हमारी सुनता है, उस प्रार्थना से खुश होकर वह हमारी कामनाओं की पूर्ति करता है, प्रार्थना और चापलूसी में हम कोई अंतर नहीं समझते।
परन्तु इस स्तोत्र में गजेन्द्र (हाथी) किसी देवी देवता की प्रार्थना नहीं करता। वह तो खुले भाव से सिर्फ प्रार्थना करता है। साथ ही साथ वह कुछ मांगता भी नहीं है। वह निवेदन करता है कि मैं जीना नहीं चाहता। मैं अज्ञानसे छूटना चाहता हूँ, जो मेरे आत्मप्रकाश को रोककर रखता है।
हाथी जीव है। नारायण ईश्वर है। जैसे तालाब में बूँद रहता है वैसे ही ईश्वर में जीव है। किसी कारण से बूँद में कम्पन होने लगे। उस कम्पन के फलस्वरूप पूरे तालाब में कम्पन होने लगे। बूँद के उस कम्पन का नाम प्रार्थना है। तालाब के कम्पन का नाम अनुकम्पा है।
उत्तम प्रार्थना वह है, जिसमें हम किसी दूसरे से याचना नहीं करते, वरन् अपने ही सर्वोत्कृष्ट रूप, अपनी ही समग्रता जिसका नाम ईश्वर है, उसके प्रति समर्पित होते हैं और उन ऊर्जाओं से जुड़ते है।
इस स्तोत्र में किसी एक व्यक्तित्व रूप आकृति वाले देवता की स्तुति नहीं है, वरन् निराकार और निर्गुण ईश्वर की स्तुति है। ईश्वर कोई और नहीं, हमारा ही पूर्ण रूप है।
परन्तु इस स्तुति के फलस्वरूप जो अनुकम्पा करते हैं वे नारायण ही हैं। सामान्यतः हम यह मानते हैं कि ईश्वर की कोई एक आकृति है ही, अथवा यह मानते हैं कि उसकी कोई आकृति हो ही नहीं सकती। दोनों तरह का आग्रह गलत है। ईश्वर सिर्फ निराकार ही नहीं है अथवा सिर्फ आकारवाला ही नहीं है, इस बात को सीधे तरह से इस स्तोत्र में कहा गया है। इसमें प्रार्थना तो निराकार का है पर प्रकट साकार होते हैं।
श्रीमद्भागवत में इस स्तोत्र (Gajendra Moksha Stotra) को दुःस्वप्न आदि का नाशक बताया गया है। परम्परानुसार इस स्तोत्र के पाठ से ऋण से मुक्ति, शत्रु से छुटकारा और दुर्भाग्य का नाश होता है। भगवान् कहते हैं कि जो लोग इस स्तुति से मेरा स्तवन करेंगे, मृत्यु के समय मैं उन्हें निर्मल बुद्धि प्रदान करूँगा।
मूलतः यह स्तोत्र (Gajendra Moksha Stotra) गजेन्द्र ऐसी स्थिति में करता है, जब संकट में पड़ कर उसकी स्वयं की शक्ति और साथी सहयोगियों की मदद जरा भी काम में नहीं आती। अंत में सभी साथी भी पीछे हट जाते हैं। जो व्यक्ति अपने आप को किसी ऐसी स्थिति में पाता हो, जहाँ से निकलना उसके वश में न हो, वैसी स्थिति में यह स्तोत्र अत्यंत लाभकारी है। उदाहरण के लिए यह स्थिति आर्थिक बाधाएँ, जैसे कर्ज, दरिद्रता आदि हो सकती है, भयंकर असाध्य रोग व्याधि हो सकती है, अथवा कोई ऐसी लत, नशा या आदत हो सकती है जिससे छुटकारा पाना अपने वश में न हो। ये सभी एक तरह से ग्राह ही हैं जो हमारे जीवन और व्यक्तित्व को ग्रसित कर लेते हैं। हम चाहते हुए भी, अपनी सारी शक्ति लगाकर भी इनसे निकल नहीं पाते हैं। ऐसी स्थिति में यह प्रार्थना बहुत असरकारक है। यह ऐसे ही किसी ग्राह (घड़ियाल) से ग्रसित जीव की निराकार ईश्वर के प्रति करुण प्रार्थना है।
गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र के लाभ (Gajendra Moksha Stotra Benefits)
- बुरे सपनों से मुक्ति: श्रीमद्भागवत के अनुसार यह स्तोत्र दुःस्वप्नों (बुरे सपनों) का नाश करने वाला है।
- कर्ज और दरिद्रता से छुटकारा: इसके पाठ से व्यक्ति को भारी ऋण (कर्ज) और आर्थिक बाधाओं से मुक्ति मिलती है।
- शत्रुओं और दुर्भाग्य का नाश: यह स्तोत्र शत्रुओं से रक्षा करता है और जीवन से दुर्भाग्य को दूर करता है।
- निर्मल बुद्धि की प्राप्ति: भगवान का यह वरदान है कि जो व्यक्ति इस स्तोत्र से उनकी स्तुति करेगा, उसे मृत्यु के समय निर्मल (शांत और स्पष्ट) बुद्धि प्राप्त होगी।
- असाध्य रोगों से रक्षा: भयंकर और असाध्य रोगों या शारीरिक व्याधियों से घिरे होने पर भी यह स्तोत्र चमत्कारिक लाभ देता है।
- बुरी लत और व्यसनों से मुक्ति: जब व्यक्ति किसी ऐसे नशे, लत या बुरी आदत में फँस जाए जहाँ से निकलना उसके वश में न हो, तब यह स्तोत्र अत्यंत असरकारक साबित होता है।
- अंतिम आश्रय: जब जीवन में ऐसा भयानक संकट आ जाए जहाँ अपना खुद का बल और सगे-संबंधियों की मदद काम न आए, तब यह स्तोत्र व्यक्ति को उस विपत्ति से उबारने का सबसे सशक्त माध्यम है।
गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र पाठ विधि (Gajendra Moksha Stotra Path Vidhi)
गजेंद्र मोक्ष का पाठ भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने तथा जीवन के संकटों या कर्ज से मुक्ति के लिए बहुत फलदायी माना जाता है। इसे सही विधि और सच्चे मन से करने के लिए इन आसान बातों का ध्यान रखें:
तैयारी कैसे करे
- स्नान और वस्त्र: सुबह जल्दी नहाकर साफ-सुथरे (हो सके तो पीले) वस्त्र पहनें।
- दिशा और स्थान: घर के मंदिर या किसी शांत जगह पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुंह करके बैठें।
- पूजा सामग्री: भगवान विष्णु की मूर्ति/तस्वीर के सामने घी का दीपक और धूप जलाएं, फिर पुष्प अर्पित करें।
पाठ करने का सही तरीका
- शुरुआत: हाथ में जल लेकर आचमन करें और मन को शांत करके भगवान श्री हरि का ध्यान करें।
- मंत्र जप: सबसे पहले “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का 3 या 11 बार जाप करें।
- पाठ: अब श्रीमद्भागवत महापुराण के अष्टम स्कंध में वर्णित गजेंद्र स्तोत्र का ध्यानपूर्वक और साफ उच्चारण के साथ पाठ करें।
- समापन: पाठ पूरा होने के बाद आरती करें, जाने-अनजाने हुई भूल-चूक के लिए क्षमा मांगें और अपने संकटों को दूर करने की प्रार्थना करें। और श्री भगवान को भोग अर्पित करें ।
गजेन्द्र मोक्ष का पाठ PDF (Gajendra Moksha Path PDF)
इति श्री गजेन्द्रमोक्ष स्तोत्रम्




