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गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र (Gajendra Moksha Stotra): संस्कृत और हिंदी अर्थ, कथा, पाठ विधि एवं इसके 7 चमत्कारिक लाभ (PDF Download)

गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र का पाठ (Gajendra Moksha Stotra)

भावार्थ : गजेन्द्र ने कहा जो जगत्‌के मूल कारण हैं और सबके हृदय में पुरुष के रूपमें विराजमान हैं एवं समस्त जगत्‌के एकमात्र स्वामी हैं, जिनके कारण ये जड शरीर और मन आदि भी चेतन बन जाते हैं, उन सर्वसमर्थ परमेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ ।। 2 ।।

भावार्थ : जिनके सहारे यह विश्व टिका है, जिनसे यह उत्पन्न हुआ है, जिन्होंने इसकी रचना की है और जो स्वयं ही इसके रूपमें प्रकट हो रहे हैं—फिर भी जो इस दृश्य जगत्से एवं उसकी कारणभूता प्रकृतिसे सर्वथा परे (विलक्षण) एवं श्रेष्ठ हैं—उन अपने-आप—बिना किसी कारण के—बने हुए भगवान्की मैं शरण लेता हूँ॥ ३ ॥

भावार्थ : यह विश्वप्रपंच उन्हीं की माया से उनमें दिख रहा है। यह कभी प्रतीत होता है, तो कभी नहीं। परन्तु उनकी दृष्टि ज्यों-की-त्यों, एक-सी रहती हैं। वे इसके साक्षी हैं और उन दोनों को ही देखते रहते हैं। वे सबके मूल हैं और अपने मूल भी वही हैं। कोई दूसरा उनका कारण नहीं है। वे ही सबसे परे प्रभु मेरी रक्षा करें।। 4 ।।

भावार्थ : प्रलयके समय लोक, लोकपाल और इन सबके कारण सम्पूर्ण रूप से नष्ट हो जाते हैं। उस समय केवल अत्यन्त घना और गहरा अन्धकार-ही-अन्धकार रहता है। परन्तु अनन्त परमात्मा उससे सर्वथा परे विराजमान रहते हैं। वे ही प्रभु मेरी रक्षा करें ।। ५ ।।

भावार्थ : उनकी लीलाओंका रहस्य जानना बहुत ही कठिन है। वे नटकी भाँति अनेकों वेष धारण करते हैं। उनके वास्तविक स्वरूपको न तो देवता जानते हैं और न ऋषि ही; फिर दूसरा ऐसा कौन प्राणी है जो वहाँ तक जा सके और उसका वर्णन कर सके? वे प्रभु मेरी रक्षा करें ।। ६ ।।

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भावार्थ : जिनके परम मंगलमय स्वरूपका दर्शन करनेके लिये महात्मागण संसार की समस्त आसक्तियों का परित्याग कर देते हैं और वनमें जाकर अखण्ड भाव से अलौकिक व्रतोंका पालन करते हैं तथा अपने आत्माओं सबसे हृदयमें विराजमान देखकर स्वाभाविक ही सबकी भलाई करते हैं वे ही मुनियों के इष्ट भगवान् मेरे सहायक और मेरी गति हैं ।। ७ ।।

भावार्थ : न उनके जन्म-कर्म हैं और न-रूप; फिर गुण और दोष कैसे हो सकते हैं? फिर भी विश्वकी सृष्टि और संहार करनेके लिये समय-समयपर वे उन नाम-रूप-गुण-दोष-जन्म-कर्म आदि को अपनी मायासे स्वीकार करते हैं ।। 8 ।।

भावार्थ : उन्हीं अनन्त शक्तिमान् सर्वैश्वर्यमय परब्रह्म परमात्माको मैं नमस्कार करता हूँ। वे अरूप होनेपर भी बहुरूप हैं। मैं उन आश्चर्य कर्म करनेवाले के चरणोंमें नमस्कार करता हूँ ।। ९ ।।

भावार्थ : स्वयंप्रकाश, (जिसको देखने के लिए किसी और साधन की जरूरत न पड़े, जो आत्मप्रदीप है, जैसे दीपक को देखने के लिए किसी दूसरे प्रकाश की जरूरत नहीं है।) सबके साक्षी परमात्माको मैं नमस्कार करता हूँ। जो मन, वाणी और चित्तसे अत्यन्त दूर भी हैं उन परमात्माको मैं नमस्कार करता हूँ ।। 10 ।।

भावार्थ : विवेकी पुरुष, जिनका अन्तःकरण शुद्ध हो चुका है, वे निष्कर्मताके द्वारा जिन्हें प्राप्त करते हैं, वैसे कैवल्यके नाथ, निर्वाण सुख और ज्ञानस्वरूप परमात्माको मैं नमस्कार करता हूँ ।। 11 ।।

भावार्थ : जो सत्त्व, रज, तम इन तीन गुणोंका धर्म स्वीकार करके क्रमशः शान्त, घोर और मूढ़ अवस्था भी धारणा करते हैं, उन भेदरहित समभावसे स्थित एवं ज्ञानघन प्रभुको मैं बार-बार नमस्कार करता हूँ ।। 12 ।।

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भावार्थ : सभी क्षेत्रोंके ज्ञाता को नमस्कार है जो सबके अध्यक्ष (स्वामी) हैं और सभी के साक्षी हैं, जो अपने आपके भी मूल पुरुष हैं और मूल प्रकृति हैं उनको नमस्कार है ।। 13 ।।

भावार्थ : जो सभी इन्द्रियों और उसके गुणों के द्रष्टा हैं, मनमें चलने वाले सभी विचारों के कारण हैं, जो नहीं है और जो है उन दोनों के द्वारा आपका ही पता चलता है। ऐसे आपको नमस्कार है ।। 14 ।।

भावार्थ : सभी के कारण रूप और बिना किसी कारण के और अद्भुत कारण रूप वाले आपको नमस्कार है। जैसे सभी नदी-झरने महा समुद्र की ओर ही जाते हैं उसी तरह समस्त वेद-शास्त्र आपकी ओर ही जाते हैं। ऐसे मोक्ष स्वरूप आपको नमस्कार है ।। 15 ।।

भावार्थ : जैसे काष्ठमें अग्नि गुप्त रहती है वैसे ही आप अपनेको गुणोंसे ढक कर रखते हैं। गुणोंमें क्षोभ होने पर मन द्वारा विविध प्रकारकी सृष्टि रचनाका संकल्प करते हैं। जो लोग नैष्कर्म्यता (कर्म त्याग) आदि द्वारा वेद शास्त्रोंसे से ऊपर उठ जाते हैं उनके आत्माके रूपमें आप स्वयं ही प्रकाशित हो जाते हैं। आपको मैं नमस्कार करता हूँ ।। 16 ।।

भावार्थ : मेरे जैसे शरणागत पशुके बंधनको काटने वाले नित्य मुक्त प्रचुर करुणा वाले, आलस्य रहित आपको नमस्कार है। आप अपने ही अंशसे सभी देह धारियोंके मनमें प्रतीत होते हैं ऐसे विस्तृत (अनन्त) भगवान आपको नमस्कार है ।। 17 ।।

भावार्थ : जो लोग शरीर, पुत्र, गुरुजन, गृह, सम्पत्ति और स्वजनोंमें आसक्त हैं- उन्हें आपकी प्राप्ति अत्यन्त कठिन है। क्योंकि आप स्वयं गुणोंकी आसक्तिसे रहित हैं। जीवन्मुक्त पुरुष अपने हृदयमें आपका निरन्तर चिन्तन करते रहते हैं। उन ईश्वरको, ज्ञानस्वरूप भगवान्को मैं नमस्कार करता हूँ ।। 18 ।।

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भावार्थ : धर्म, अर्थ काम और मोक्षकी कामनासे मनुष्य जिनका भजन करके अपनी अभीष्ट वस्तु प्राप्त कर लेते हैं। इतना ही नहीं, वे उन भक्तोंको सभी प्रकारका सुख देते हैं और अपने ही जैसे अविनाशी पार्षद शरीर भी देते हैं। वे ही परम दयालु प्रभु मेरा उद्धार करें ।। 19 ।।

भावार्थ : जिनके भक्तजन एकान्त होकर, उनकी शरणमें जाकर कुछ भी इच्छा न रखते हुए भगवान की अद्भुत और मंगलमय चरित्र का गायन करते हुए आनन्दके समुद्रमें मग्न रहते हैं (उनकी मैं स्तुति करता हूँ) ।। 20 ।।

भावार्थ : उन अविनाशी, सर्वव्यापक, सर्वश्रेष्ठ, ब्रह्मादिके भी नियामक, अभक्तोंके लिये अप्रकट होनेपर भी भक्तियोगद्वारा प्राप्त करनेयोग्य, अत्यन्त निकट होनेपर भी मायाके आवरणके कारण अत्यन्त दूर प्रतीत होनेवाले, इन्द्रियोंके द्वारा अगम्य तथा अत्यन्त दुर्विज्ञेय, अन्तरहित किंतु सबके आदिकारण एवं सब ओरसे परिपूर्ण उन भगवान्की मैं स्तुति करता हूँ॥ २१ ॥

भावार्थ : ब्रह्मादि समस्त देवता, चारों वेद तथा सम्पूर्ण चराचर जीव नाम और आकृतिके भेदसे जिनके अत्यन्त क्षुद्र अंशके द्वारा रचे गये हैं॥ २२ ॥

भावार्थ : जिस प्रकार प्रज्वलित अग्निसे लपटें तथा सूर्यसे किरणें बार-बार निकलती हैं और पुनः अपने कारणमें लीन हो जाती हैं, उसी प्रकार बुद्धि, मन, इन्द्रियाँ और नाना योनियोंके शरीर—यह गुणमय प्रपंच जिन स्वयंप्रकाश परमात्मासे प्रकट होता है और पुनः उन्हींमें लीन हो जाता है॥ २३ ॥

भावार्थ : वे भगवान् वास्तवमें न तो देवता हैं न असुर, न मनुष्य हैं न तिर्यक् (मनुष्यसे नीची—पशु, पक्षी आदि किसी) योनिके प्राणी हैं। न वे स्त्री हैं न पुरुष और न नपुंसक ही हैं। न वे ऐसे कोई जीव हैं, जिनका इन तीनों ही श्रेणियोंमें समावेश न हो सके। न वे गुण हैं न कर्म, न कार्य हैं न तो कारण ही। सबका निषेध हो जानेपर जो कुछ बच रहता है, वही उनका स्वरूप है और वे ही सब कुछ हैं। ऐसे भगवान् मेरे उद्धारके लिये आविर्भूत हों ॥ २४ ॥

भावार्थ : मैं इस ग्राहके चंगुलसे छूटकर जीवित रहना नहीं चाहता; क्योंकि भीतर और बाहर—सब ओरसे अज्ञानके द्वारा ढके हुए इस हाथीके शरीरसे मुझे क्या लेना है। मैं तो आत्माके प्रकाशको ढक देनेवाले उस अज्ञानकी निवृत्ति चाहता हूँ, जिसका कालक्रमसे अपने-आप नाश नहीं होता, अपितु भगवान्की दयासे अथवा ज्ञानके उदयसे होता है ॥ २५ ॥

भावार्थ : इस प्रकार मोक्षका अभिलाषी मैं विश्वके रचयिता, स्वयं विश्वके रूपमें प्रकट तथा विश्वसे सर्वथा परे, विश्वको खिलौना बनाकर खेलनेवाले, विश्वमें आत्मारूपसे व्याप्त, अजन्मा, सर्वव्यापक एवं प्राप्तव्य वस्तुओंमें सर्वश्रेष्ठ श्रीभगवान्‌को केवल प्रणाम ही करता हूँ—उनकी शरणमें हूँ ॥ २६ ॥

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भावार्थ : जिन्होंने भगवद्भक्तिरूप योगके द्वारा कर्मोंको जला डाला है, वे योगी लोग उसी योगके द्वारा शुद्ध किये हुए अपने हृदयमें जिन्हें प्रकट हुआ देखते हैं, उन योगेश्वरभगवान्‌को मैं नमस्कार करता हूँ ॥ २७ ॥

भावार्थ : जिनकी त्रिगुणात्मक (सत्त्व-रज-तमरूप) शक्तियोंका रागरूप वेग असह्य है, जो सम्पूर्ण इन्द्रियोंके विषयरूपमें प्रतीत हो रहे हैं, तथापि जिनकी इन्द्रियाँ विषयोंमें ही रची-पची रहती हैं—ऐसे लोगोंको जिनका मार्ग भी मिलना असम्भव है, उन शरणागतरक्षक एवं अपार शक्तिशाली आपको बार-बार नमस्कार है ॥ २८ ॥

भावार्थ : जिनकी अविद्या नामक शक्तिके कार्यरूप अहंकारसे ढके हुए अपने स्वरूपको यह जीव जान नहीं पाता, उन अपार महिमावाले भगवान्‌की मैं शरण आया हूँ ॥ २९ ॥

श्री शुकदेव उवाच –

भावार्थ : श्रीशुकदेवजी कहते हैं—इस तरह गजेन्द्र द्वारा वर्णित निर्विशेष ईश्वर की स्तुति से ब्रह्मा आदि देवता उसकी रक्षा करनेके लिये नहीं आये। क्योंकि वे सब भिन्न-भिन्न नाम और रूपको अपना स्वरूप मानते हैं। उस समय सभीके आत्मा और सभी देवताओं के स्वरूप होनेके कारण स्वयं भगवान् श्रीहरि प्रकट हो गये ॥ ३० ॥

भावार्थ : उस गजेन्द्रको अत्यंत पीड़ित देखकर, उसकी स्तुति को सुनकर सम्पूर्ण जगत्‌में रहनेवाले विश्वके एकमात्र आधार भगवान् वेदमय गरुड़ पर बैठे हुए, चक्र आदि आयुध सहित, बड़ी शीघ्रता से वहाँ प्रगट हो गए। उनके साथ स्तुति करते हुए देवतागण भी आ गए ॥ ३१ ॥

भावार्थ : सरोवरके भीतर अत्यंत बलवान् ग्राहसे पकड़ा हुआ और व्याकुल हाथी ने देखा कि आकाशमें गरुड़ पर सवार भगवान् चक्रको उठाये हुए आ रहे हैं। उस हाथी ने सरोवरसे एक सुन्दर कमलके पुष्पको सूंडमें ऊपर उठाया और अत्यंत कष्टसे बोला-नारायण! अखिलगुरो! भगवन्! आपको नमस्कार है।। 32 ।

गजेंद्र मोक्ष कथा (Gajendra Moksha Katha in Hindi)

गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र के लाभ (Gajendra Moksha Stotra Benefits)

गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र पाठ विधि (Gajendra Moksha Stotra Path Vidhi)

गजेंद्र मोक्ष का पाठ भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने तथा जीवन के संकटों या कर्ज से मुक्ति के लिए बहुत फलदायी माना जाता है। इसे सही विधि और सच्चे मन से करने के लिए इन आसान बातों का ध्यान रखें:

तैयारी कैसे करे

  • स्नान और वस्त्र: सुबह जल्दी नहाकर साफ-सुथरे (हो सके तो पीले) वस्त्र पहनें।
  • दिशा और स्थान: घर के मंदिर या किसी शांत जगह पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुंह करके बैठें।
  • पूजा सामग्री: भगवान विष्णु की मूर्ति/तस्वीर के सामने घी का दीपक और धूप जलाएं, फिर पुष्प अर्पित करें।

पाठ करने का सही तरीका

  • शुरुआत: हाथ में जल लेकर आचमन करें और मन को शांत करके भगवान श्री हरि का ध्यान करें।
  • मंत्र जप: सबसे पहले “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का 3 या 11 बार जाप करें।
  • पाठ: अब श्रीमद्भागवत महापुराण के अष्टम स्कंध में वर्णित गजेंद्र स्तोत्र का ध्यानपूर्वक और साफ उच्चारण के साथ पाठ करें।
  • समापन: पाठ पूरा होने के बाद आरती करें, जाने-अनजाने हुई भूल-चूक के लिए क्षमा मांगें और अपने संकटों को दूर करने की प्रार्थना करें। और श्री भगवान को भोग अर्पित करें ।

गजेन्द्र मोक्ष का पाठ PDF (Gajendra Moksha Path PDF)

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