श्रीरामशतनामस्तोत्र (Shri Ram Shatanamastotra)
शम्भुरुवाच (Lord Shiva said):
राघवं करुणाकरं भवनाशनं दुरितापहम् ।
माधवं खगगामिनं जलरूपिणं परमेश्वरम् ॥
पालकं जनतारकं भवहारकं रिपुमारकम् ।
त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥
भूधवं वनमालिनं घनरूपिणं धरणीधरम् ।
श्रीहरिं त्रिगुणात्मकं तुलसीधवं मधुरस्वरम् ॥
श्रीकरं शरणप्रदं मधुमारकं व्रजपालकम् ।
त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥
विट्ठलं मथुरास्थितं रजकान्तकं गजमारकम् ।
सस्तुतं बकमारकं वृषघातकं तुरगार्दनम् ॥
नन्दजं वसुदेवजं बलियज्ञगं सुरपालकम् ।
त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥
केशवं कपिवेष्टितं कपिमारकं मृगमर्दनम् ।
सुन्दरं द्विजपालकं दितिजादनं दनुजार्दनम् ॥
बालकं खरमर्दनं ऋषिप्रपूजितं मुनिचिन्तितम् ।
त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥
शंकरं जलशायिनं कुशबालकं रथवाहनम् ।
सरयूनतं प्रियपुष्पकं प्रियभूसुरं लवबालकम् ॥
श्रीधरं मधुसूदनं भरताग्रजं गरुडध्वजम् ।
त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥
गोप्रियं गुरुपुत्रदं वदतां वरं करुणानिधिम् ।
भक्तपं जनतोषदं सुरपूजितं श्रुतिभिः स्तुतम् ॥
भुक्तिदं जनमुक्तिदं जनरञ्जनं नृपनन्दनम् ।
त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥
चिह्नदं चिरजीविनं मणिमालिनं वरदोन्मुखम् ।
श्रीधरं धृतिदायकं बलवर्धनं गतिदायकम् ॥
शान्तिदं जनतारकं शरधारिणं गजगामिनम् ।
त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥
शार्ङ्गिणं कमलाननं कमलादृशं पदपङ्कजम् ।
श्यामलम् रविभासुरं शशिसौख्यदं करुणार्णवम् ॥
इस स्तोत्र का भी पाठ करें – श्री राम प्रातः स्मरण स्तोत्र
सत्पतिं नृपपालकं नृपवन्दितं नृपतिप्रियम् ।
त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥
निर्गुणं सगुणात्मकं नृपमण्डनं मतिवर्धनम् ।
अच्युतं पुरुषोत्तमं परमेष्ठिनं स्मितभाषिणम् ॥
ईश्वरं हनुमच्छ्रुतं कमलाधिपं जनसाक्षिणम् ।
त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥
ईश्वरोदितमेतदुत्तममादराच्छतनामकम ।
यः पठेद् भुवि मानवस्तव भक्तिमांस्तपनोदये ॥
त्वत्पदं निजबन्धुदारसुतैर्यतैर्यश्चिरमेत्य नः ।
सोऽस्तु ते पदसेवने बहुतत्परो मम वाक्यतः ॥
(आनन्दरामायण, पूर्णकाण्ड ६।३२—५१)
श्रीराम शतनाम स्तोत्र (Shri Ram Shatanamastotra) का अर्थ:-
श्रीशिवजी कहते हैं— जो रघुवंशमें उत्पन्न, करुणाकी खान, आवागमनके विनाशक, पापापहारी, लक्ष्मीके पति, पक्षिराज गरुडपर सवार होनेवाले, जलरूपमें स्थित, परमेश्वर (जगत्के) पालक, भक्तजनोंका उद्धार करनेवाले, भव-बाधाके नाशक, शत्रुओंका संहार करनेवाले, नररूपधारी जगदीश्वर हैं, उन आप रघुनन्दनका मैं भजन करता हूँ।
जो पृथिवीके पति, वनमाला-धारी, नील मेघ-सदृश श्यामकाय, पृथिवीको धारण करनेवाले, श्रीहरि, सत्त्व, रजस्, तमस्— इन तीनों गुणोंसे समन्वित, तुलसीके पति, मधुर स्वरसे सम्पन्न, शोभाका विस्तार करनेवाले, शरणदाता, मधु नामक दैत्यका वध करनेवाले, व्रजके रक्षक, नररूपधारी जगदीश्वर हैं, उन आप रघुनन्दनका मैं भजन करता हूँ।
जो विट्ठलरूपसे मथुरामें स्थित, रजकके संहारक, गजको मारनेवाले, सत्पुरुषोंद्वारा संस्तुत, बकासुर, वृषासुर और अश्वरूपी केशी नामक राक्षसका वध करनेवाले, नन्दकुमार, वसुदेवके पुत्र, बलिके यज्ञमें गमन करनेवाले, देवताओंके रक्षक, मानवरूपधारी जगदीश्वर हैं, उन आप रघुनन्दनका मैं भजन करता हूँ।
जो केशव, वानरोंद्वारा आवेष्टित, (वाली नामक) वानरका वध करनेवाले, मृगरूपी राक्षस मारीचके संहारक, शोभाशाली, ब्राह्मणोंके रक्षक, दैत्यों और दानवोंके वधकर्ता, बालरूपधारी, खर नामक राक्षसका वध करनेवाले, ऋषियोंद्वारा पूजित, मुनियोंद्वारा चिन्तित, नररूपधारी जगदीश्वर हैं, उन आप रघुनन्दनका मैं भजन करता हूँ।
जो कल्याणकारी तथा जलमें शयन करनेवाले हैं, कुश जिनके बालक (पुत्र) हैं, रथ जिनका वाहन है, जो सरयूद्वारा नमस्कृत, पुष्पक विमानके प्रेमी और ब्राह्मणोंको प्रिय हैं, लव जिनका बालक (पुत्र) है, जो (वक्षःस्थलपर) लक्ष्मीको धारण करनेवाले, मधु नामक राक्षसके संहारक और भरतके ज्येष्ठ भ्राता हैं, जिनकी ध्वजापर गरुडका चिह्न वर्तमान रहता है, जो मानवरूपधारी जगदीश्वर हैं, उन आप रघुनन्दनका मैं भजन करता हूँ।
जो गौओंके प्रेमी, यमलोकसे गुरुपुत्रको लाकर गुरुको प्रदान करनेवाले, वक्ताओंमें श्रेष्ठ, दयानिधान, भक्तोंके रक्षक, स्वजनोंके लिये सन्तोषदाता, देवताओंद्वारा पूजित, श्रुतियोंद्वारा संस्तुत, भोगदाता, स्वजनोंके लिये मुक्तिदायक, जनताको प्रसन्न करनेवाले, राजकुमार, मनुष्यरूपधारी जगदीश्वर हैं, उन आप रघुनन्दनका मैं भजन करता हूँ।
जो चिद्धनस्वरूप, चिरजीवी, मणियोंकी माला धारण करनेवाले, वर प्रदान करनेके लिये उद्यत, सौन्दर्यशाली, धैर्य प्रदान करनेवाले, बलवर्धक, मोक्षदाता, शान्तिदायक, भक्तोंको तारनेवाले, बाणधारी, हाथीकी-सी चालसे चलनेवाले (अथवा हाथीकी सवारी करनेवाले), नररूपधारी जगदीश्वर हैं, उन आप रघुनन्दनका मैं भजन करता हूँ।
जो शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले हैं; जिनके चरण और मुख कमल-सरीखे हैं, जो लक्ष्मीकी ओर निहारते रहते हैं, जिनके शरीरका रंग श्याम है, जो सूर्यके समान देदीप्यमान, चन्द्रमा-सरीखे सुखदाता, दयासागर, श्रेष्ठ स्वामी, राजाओंके रक्षक, राजाओंद्वारा वन्दित, राजाओंके लिये प्रिय, मानवरूपधारी जगदीश्वर हैं, उन आप रघुनन्दनका मैं भजन करता हूँ।
जो निर्गुण एवं सगुणस्वरूप, राजाओंमें भूषणरूप, बुद्धिवर्धक, अपनी मर्यादासे च्युत न होनेवाले, पुरुषोंमें श्रेष्ठ, ब्रह्मस्वरूप, मुसकराते हुए बोलनेवाले, ऐश्वर्यशाली, हनुमान्द्वारा संस्तुत, लक्ष्मीके अधीश्वर, लोकसाक्षी, नररूपधारी जगदीश्वर हैं, उन आप रघुनन्दनका मैं भजन करता हूँ।
जो मनुष्य भूतलपर सूर्योदयकालमें शिवजीद्वारा कथित इस उत्तम शतनाम नामक स्तोत्रका आदरपूर्वक पाठ करेगा, उसकी आपके चरणोंमें भक्ति हो जायगी तथा वह मेरे कथनानुसार अपने बन्धु, स्त्री और पुत्रोंके साथ मेरे लोकमें आकर चिरकालतक आपके चरणोंकी सेवामें दृढ़तापूर्वक तत्पर हो जायगा।




