Shri Sukta Path in Hindi Sanskrit

श्री सूक्त पाठ हिंदी अर्थ सहित Shri Suktam in Hindi

श्री सूक्त Shri Suktam माता महालक्ष्मी की आराधना करने हेतु उनको समर्पित 16 मंत्रों का समूह है। यह सूक्त ऋग्वेद से लिया गया है।

श्री सूक्त पाठ हिंदी अर्थ सहित Shri Suktam Path in Hindi Sanskrit

Shri Sukta Path in Hindi Sanskrit

श्री सूक्त पाठ Shri Suktam Path

भावार्थ : हे जातवेद अग्ने ! आप बीते हुए समस्त वृत्तान्तों को जानने वाले तथा बतलाने वाले हो।
अतः सुवर्णसदृश्य पीत वर्णवाली तथा किञ्चित हरित वर्णवाली, सुवर्ण पुष्पों एवं चांदी के पुष्पों की माला धारण करने वाली, चंद्रमा के समान प्रकाशमान, चंद्रमा की ही तरह सबको प्रसन्न करने वाली, चंचला, हिरण्यमयी रूप वाली, एवं हिरण्यमय ही जिनका शरीर है ऐसी सुवर्णमयी लक्ष्मी को मेरे लिए बुलाओ।

  • हिरण्यवर्णां : हिरण्य = सुवर्ण, वर्ण = रंग अर्थात जिनके शरीर का रंग सुनहरा है ‘ॐ हिरण्यवर्णायै नमः’ यह नवाक्षर मंत्र योगसाधक है ।
  • हरिणीं : हरितवर्ण की, हल्दी जैसी आभा वाली । अपने शरीर में हल्दी लगाई होने से पीले वर्ण की। ‘ॐ हरण्यै नमः’ यह षडक्षर मंत्र योग का उत्तम साधन एवं सर्व कार्यसाधक है ।
  • सुवर्णरजतस्त्रजाम् : सुवर्ण और चांदी से निर्मित कमलों (पुष्पों) की मालाएं पहनी हुई । ‘ॐ सुवर्णस्त्रजे नमः’ कुबेर ने मेरुपर्वत् पर इस मंत्र का जाप करके धनेशत्व प्राप्त किया था। ॐ रजतस्त्रजे नमः’ रुद्र श्रेष्ठ महादेव कैलाश पर इस मंत्र का जप करके रजताधिपति बने । 
  • चन्द्रां : चंद्रमा की तरह प्रकाशित और सबको प्रसन्न करने वाली । ‘ॐ चन्द्रायै नमः’ यह मंत्र आनंदजनक है और संसार की आग को बुझाता है ।
  • हिरण्मयीं : सुनहरे रूप वाली।  ‘ॐ हिरण्मय्यै नमः’ यह मंत्र सभी मनोरथों को पूरा करता है, इस मंत्र के द्वारा लक्ष्मी की स्तुति करने से योगियों को योग प्राप्ति होती है ।
  • लक्ष्मीं : लक्षणयुक्त, शोभा-संपत्ति रूप। ज्ञान ऐश्वर्य, सुख, आरोग्य, धन, धान्य, जय आदि लक्ष्म (चिन्ह) के कारण उन्हें लक्ष्मी कहते हैं । ‘ॐ लक्ष्म्यै नमः’ यह पंचाक्षर मंत्र पृथ्वी पर भोगों को प्रदान करता है अर्थात उन्हें उत्पन्न करता है ।
  • जातवेद: = अग्निदेव! आ वह = भेजो

भावार्थ : हे सर्वज्ञ अग्निदेव! स्थिर एवं अविनाशी लक्ष्मी को मेरे पास बुलाइए, कि जिनके आने के बाद मैं सोना, चांदी, गाएं, घोड़े आदि पशुसमूह और अनुकूल पुत्र, हितेच्छु मित्र, निष्ठावान दास आदि को प्राप्त करूँ ।

  • जातवेद : अग्नि देव ! अग्नि देवताओं का होता (होतृ) है, इसलिए आवाहन प्रक्रिया उसके आधीन है, संतुष्ट अग्नि यजमान को लक्ष्मी प्रदान करता है ।
  • ताम् : उस
  • अनपगामिनीम् : अपगमन नहीं करने वाली, अर्थात स्थिर ।  मुझे छोड़कर कहीं भी अन्यत्र नहीं जाने वाली
  • लक्ष्मीम् : लक्ष्मी को
  • म  आवह : मेरे पास बुलाओ
  • यस्यां : जब वह आवाहित होती है तब (जब वो आती हैं)
  • हिरण्यं : सुवर्ण , गाम् : गाय आदि पशुओं को, अश्वम : घोडा आदि वाहन
  • पुरुषान् : पुत्र, मित्र, दास आदि पुरुष
  • अहं विन्देयं : मैं प्राप्त करूँ

भावार्थ : जिन देवी के आगे घोड़े और बीच में रथ है, अथवा जिनके आगे घोड़े जुते हुए हैं ऐसे रथ मे सवार, हाथियों के निनाद से जिनकी भव्यता प्रतीत होती है, ऐसी देदीप्यमान, एवं समस्त जनों को आश्रय देने वाली राजलक्ष्मी को मैं अपने समीप बुलाता हूँ । वह देवी मुझपर प्रीति करें, मेरा सेवन करें और मेरे घर सप्रेम रहें।

  • अश्वपूर्वां: जिनके आगे अश्व हैं ऐसी राजलक्ष्मी ।
  • रथमध्यां: जिनके मध्यभाग में रथ है, अथवा जो रथ के मध्य भाग में बैठी हुयी हैं ।
  • हस्तिनाद्प्रबोधिनीम्: हाथियों की चिंघाड़ से अपनी उपस्थिति का ज्ञान कराने वाली ।
  • हस्तिनाद्प्रमोदिनी : हाथियों की चिंघाड़ से प्रसन्न होने वाली ।
  • श्रियं: लक्ष्मी देवी। भक्तों की करुण पुकार सुनने वाली ।
  • देवीम् : दीप्यमान (सुवर्ण से चमकदार)
  • उपह्वये : मेरे समीप में आने के लिए आवाहन करता हूँ ।
  • मा जुषताम : मेरा सेवन करें अर्थात मुझको मिलें । मेरे घर प्रेम पूर्वक रहें ।

भावार्थ : जिनका स्वरूप, वाणी और मन का विषय न होने के कारण अवर्णनीय हैं तथा जो मंदहास्ययुक्ता हैं, जो चारों ओर से सुवर्ण से ओत-प्रोत हैं। दयालु ह्रदय वाली या समुद्र से उत्पन्न होने के कारण आद्र शरीर वाली होते हुए भी दीप्यमान हैं (लक्ष्मी जी दया से आद्र होते हुए भी तेज से देदीप्यमान हैं) । स्वयं पूर्णकाम होने के कारण भक्तों के नानाविध मनोरथों को पूर्ण करने वाली, कमल के ऊपर विराजमान तथा कमल सदृश्य गृह में निवास करने वाली, जगतप्रसिद्ध लक्ष्मी को मैं अपने समीप बुलाता हूँ ।

  • काम् : जिसका ज्ञान वाणी और मन से नहीं होता ऐसी अनिर्वचनीय स्वरूपवाली ।
  • सोस्मितां: उत्कृष्ठ मंद मुस्कान वाली ।
  • हिरण्य्प्राकाराम् : सुवर्ण का आवरण वाली, सुवर्ण की उत्कृष्ठ आकृति वाली
  • आद्राम् : क्षीर समुद्र से उत्पन्न होने के कारण भीगी हुई
  • ज्वलन्तीं: सभी प्राणियों के हृदयाकाश में सदा जलने वाली ज्योति स्वरूपा।
  • तृप्तां: भक्ति, पूजा आदि से तृप्त होने वाली
  • तर्पयन्तीम्: मनोरथों की पूर्ति द्वारा भक्तों को तृप्त करने वाली
  • पद्मे स्थितां: कमल पर विराजमान
  • पदमवर्णां: कमल जैसी कान्ति वाली, श्वेत-अरुण मिश्र रंगवाली ।

भावार्थ : चंद्रमा के सदृश्य प्रकाश वाली, प्रकृष्ट कांतिवाली, अपनी कीर्ति से देदीप्यमान, स्वर्ग लोक में इन्द्र आदि देवताओं से सेवित, अतिदानशीला, कमल के मध्य मे रहने वाली, रक्षा करने वाली या आश्रय देने वाली, जगत प्रसिद्ध उन भगवती लक्ष्मी को मैं प्राप्त करता हूँ। हे लक्ष्मी ! आपकी कृपा से मेरी दरिद्रता नष्ट हो, अतः इसका मैं तुम्हें स्वीकार करता हूँ अर्थात तुम्हारा आश्रय लेता हूँ ।

  • चन्द्रां: चंद्रमा की तरह प्रकाशमान
  • प्रभासां: सुशोभित, परिपूर्ण प्रेमरूप वैभव की प्रभा से सम्पन्न।
  • यशसा ज्वलन्ती: कीर्ति से देदीप्यमान, चौदह लोकों में ऐश्वर्य, उदारता, संपत्ति आदि कीर्ति से प्रकाशमान ।
  • देवजुष्टाम् : देवों से सेवित। स्वर्गलोक में इन्द्र आदि देवताओं से पूजित।
  • उदाराम् : सर्वव्यापी परम उदार
  • पद्मिनीमीम्: कमल में बैठी हुई, हाथ में कमल वाली
  • शरणं प्रपध्ये: शरण में आया हूँ ।
  • अलक्ष्मी मे : मेरी दरिद्रता
  • नश्यतां: नष्ट हो जाए
  • त्वां वृणे: मैं आपकी शरण में आया हूँ

भावार्थ : हे सूर्य के समान कांतिवाली ! आपके तेज से वनस्पति बिना पुष्प के फल देने वाला एक वृक्ष -विशेष उत्पन्न हुआ । तदन्तर आपके हाथ से बिल्ववृक्ष उत्पन्न हुआ । उस बिल्व वृक्ष का फल मेरे भीतर बाहर दरिद्रता को दूर करे ।

भावार्थ : हे लक्ष्मी ! देवसखा अर्थात श्री महादेव के सखा कुबेर या इन्द्रआदि देवताओं की अग्नि मुझे प्राप्त हो अर्थात मैं अग्नि की उपासना करूँ । एवं मणि के साथ अर्थात चिंतामणी के साथ, कुबेर के मित्र मणिभद्र के साथ या रत्नों के साथ, कीर्ति अर्थात दक्षकन्या, कुबेर की कोषशाला या यश मुझे प्राप्त हो । मैं इस भारत वर्ष में उत्पन्न हुआ हूँ इसलिए हे कुबेरदेव ! आप यश और ऐश्वर्य दोनों ही मुझे प्रदान करें ।

भावार्थ : भूख तथा प्यास रूपी मल को धारण करने वाली एवं लक्ष्मी जी कि ज्येष्ठ बहन दरिद्रता का मैं नाश करता हूँ । हे लक्ष्मी ! आप मेरे घर से अनैश्चर्य तथा धनवृद्धि के सभी प्रतिबंधक विघ्नों को दूर करें।

भावार्थ : सुगंधित पुष्प के अर्पण करने से प्राप्त करने योग्य, किसी से भी दबाने योग्य नहीं, धन-धान्य आदि से सदा परिपूर्ण, गौ-अश्व  आदि पशुओं की समृद्धि को देने वाली, समस्त प्राणियों की स्वामिनी तथा जगत प्रसिद्ध लक्ष्मी को मैं अपने घर बुलाता हूँ ।

भावार्थ : हे लक्ष्मी ! मैं तुम्हारे प्रभाव से मानसिक इच्छा एवं संकल्प, वाणी की सत्यता, गौ आदि पशुओं के रूप अर्थात दुग्ध-दध्यादि एवं यव, वोहि आदि अन्नों के रूप अर्थात भक्ष्य, भोज्य, चोष्य, लेह्य, चतुर्विध भोज्य पदार्थों सभी को प्राप्त करूँ ।  संपत्ति-यश मुझमें आश्रय लेवें अर्थात मैं धनवान-कीर्तिमान बनूँ ।

भावार्थ : कर्दम नामक ऋषि-पुत्र से लक्ष्मी प्रकृष्ट पुत्रवाली हुई हैं । हे कर्दम ! आप मुझमें अच्छी तरह वास करें, इतनी ही प्रार्थना नहीं है अपितु कमल की माला धारण करने वाली, सम्पूर्ण जगत की माता लक्ष्मी को मेरे कुल मे निवास कराओ ।

भावार्थ : जिस प्रकार कर्दम की संतति ख्याति से लक्ष्मी का अवतार हुआ है, उसी प्रकार अन्य कल्प में भी समुद्र से चौदह रत्नों के साथ माँ लक्ष्मी का आविर्भाव हुआ है । जलदेवता स्निग्ध अर्थात मनोहर पदार्थों को उत्पन्न करें (पदार्थों में सुंदरता ही लक्ष्मी हैं)। लक्ष्मी के आनंद, कर्दम, चिक्लीत और श्रीत – ये चार पुत्र हैं । इनमें से चिक्लीत से प्रार्थना की जाती है कि हे लक्ष्मीपुत्र चिक्लीत ! तुम मेरे गृह में निवास करो । केवल तुम ही नहीं, अपितु दिव्यगुणयुक्ता अपनी माता लक्ष्मी को भी मेरे घर में निवास कराओ ।

भावार्थ : हे जातवेद अग्निदेव ! आप मेरे घर में पुष्करिणी अर्थात हाथियों के झुंडाग्र से अभिषिच्यमाना, आर्द्र शरीरवाली, पुष्टि को देने वाली अथवा पुष्टि स्वरूपा रक्त और पीत वर्ण वाली, कमल की माला धारण कर जगत को प्रकाशित करने वाली प्रकाश स्वरूपा लक्ष्मी को बुलाओ ।

भावार्थ : हे जातवेदा अग्नि ! आप मेरे घर में भक्तों पर सदा सर्वदा दयाद्रचित्त अथवा समस्त भुवन जिनकी याचना करते हैं, दुष्टों को दंड देने वाली अथवा यष्टिवत अवलंबनीया, सुंदर वर्णवाली तथा सुवर्ण की माला धारण करने वाली सूर्यज्वा अर्थात जिस प्रकार सूर्य अपने प्रकाश और वृष्टि द्वारा जगत का पालन-पोषण करता है उसी प्रकार लक्ष्मी ज्ञान और धन के द्वारा जगत का पालन-पोषण करती हैं अतः प्रकाश स्वरूपा लक्ष्मी को बुलाओ ।

भावार्थ : हे जातवेद अग्नि ! आप मेरे यहाँ उन जगत विख्यात लक्ष्मी को, जो मुझे छोड़कर अन्यत्र कहीं न जाने वाली हों, उन लक्ष्मी को बुलाओ । जिन लक्ष्मी के द्वारा मैं सुवर्ण, उत्तम ऐश्वर्य, गौ, दासी, घोड़े, और पुत्र- पौत्रादि  को प्राप्त करूँ अर्थात अचला लक्ष्मी को प्राप्त करूँ ।

भावार्थ : जो मनुष्य लक्ष्मी प्राप्ति की कामना करता हो वह श्रद्धा-भक्ति पूर्वक और सावधान होकर नित्य प्रतिदिन अग्नि में गौ के घृत का होम और उसके साथ लक्ष्मी-सूक्त की पूर्वोक्त पंद्रह ऋचाओं का जप निरंतर करे ।

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