Maruti Kavach मारुति कवच

श्री मारुति कवच | Maruti Kavach

मारुति कवच Maruti Kavach नारद-पुराण से लिया गया है। इस कवच का पाठ करने से मनुष्य के सभी दु:खों एवं संकटों का नाश होता है। भूत-प्रेत बाधा से रक्षा होती है, शत्रु से उत्पन्न दु:ख का नाश होता है । यह कवच सभी दुर्घटनाओं से साधक की रक्षा करता है। मोह का नाश करने वाले तथा विजय प्रदान करने वाले इस अत्यंत प्रभावशाली और अमोघ स्तोत्र का पाठ नियमित रूप से करने वाले साधक पर भगवान मारुति शीघ्र प्रसन्न होते हैं।

सनत्कुमार जी ने कहा – मुनीश्‍वर मैंने तुमसे कार्तवीर्य कवच का वर्णन किया। अब मोहनाशक और विजयप्रद मारूति कवच का वर्णन सुनो ॥ १॥

जिसके धारण करने से सभी उपद्रव तत्काल नष्‍ट हो जाते हैं तथा भूत, प्रेत एवं शत्रु से उत्पन्न दु:ख का भी नाश हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ॥ २॥

एक समय की बात है, मैं मन को रमानेवालों में श्रेष्‍ठ भगवान श्रीराम का दर्शन करने के लिए अयोध्‍या गया हुआ था। वे आनंदवन में बैठकर अपने ही स्वरुप का ध्‍यान कर रहे थे ॥ ३॥

वहां पहुंचकर देवेश्‍वरों से पूजित रमानाथ श्रीराम को नमस्कार कर के उन्हीं के आदेश से उनके सामने ही एक आसन पर बैठ गया ॥ ४॥

उस जगह मैंने उनसे आरंभ से लेकर रावण वध तक का सारा वृतांत पूछा। तब राजाधिराज श्रीराम ने बड़े आदर के साथ स्वयं वह सारी कथा कह सुनाई ॥ ५॥

तत्पश्‍चात कथा के अंत में भगवान ने मुझे मारुति कवच प्रदान किया, जिसका मैं तुम्हारे समक्ष वर्णन करुंगा। तुम इसे कहीं भी प्रकट न करना ॥ ६॥

नारद! श्रीराम ने बालभाव से भविष्‍य में होने वाला यह सब वृतान्‍त बताया और अंजनीनंदन हनुमान का कवच भी कह सुनाया, जो भोग और मोक्ष देने वाला है ॥ ७॥

पूर्व दिशा में श्री हनुमान रक्षा करें, दक्षिण दिशा में पवनपुत्र रक्षा करें। पश्चिम दिशा में रावणपुत्र अक्षयकुमार के विनाशक रक्षा करें तथा उत्तर दिशा में सागरतारक (समुद्र को तैर जाने वाले ) रक्षा करें ॥ ८॥

ऊर्ध्‍व दिशा में केसरी के प्रिय पुत्र कपिश्रेष्‍ठ रक्षा करें। अधोभाग में विष्‍णुभक्त रक्षा करें तथा दिशाओं के मध्‍यभाग में पावनि (पवन पुत्र ) रक्षा करें ॥ ९॥

लंका जलाने वाले हनुमान जी संपूर्ण विपत्तियों से निरंतर हमारा संरक्षण करें। सुग्रीव के मंत्री मस्तक की करें। वायुनंदन हनुमान भालदेश की रक्षा करें। महावीर दोनों भौंहों के मध्‍यभाग में निरंतर रक्षा करें । छायाग्राहिणी राक्षसी का अपहरण करने वाले तथा वानरों के स्वामी हनुमान जी हमारे दोनों नेत्रों की रक्षा करें ॥ १०-११॥

श्रीराम के सेवक दोनों कपोलों तथा कानों के मूलभागों की रक्षा करें, अंजना के पुत्र नासिका के अग्रभाग की तथा बंदरों के स्वामी मुख की रक्षा करें ॥ १२॥

दैत्यों के शत्रु कण्‍ठ की रक्षा करें, देवशत्रुओं को जीतनेवाले दोनों कंधों की रक्षा करें। महातेजस्वी दोनों भुजाओं और चरणरूपी शस्त्रवाले दोनों हाथों की रक्षा करें ॥ १३॥

नखरुपी शस्त्रवाले नखों की रक्षा करें, कपियों के स्वामी कुक्षिभाग की रक्षा करें। अंगूठी ले जानेवाले वक्षस्थल की तथा भुजारूपी आयुधवाले दोनों पार्श्‍वभागों की रक्षा करें ॥ १४॥

लंका को भूज देने वाले पृष्‍ठ भाग की निरंतर रक्षा करें। श्रीराम भक्त नाभि की और अनिल (पवन) पुत्र कमर की रक्षा करें ॥ १५॥

महाप्राज्ञ गुह्यभाग की तथा अतिथिप्रिय जांघों की रक्षा करे। लंका के महलों को नष्‍ट करने वाले दोनों ऊरुओं तथा घुटनों की रक्षा करें ॥ १६॥

कपिश्रेष्‍ठ दोनों पिण्‍डलियों की रक्षा करें। महाबलवान दोनों गुल्फों (टखनों) की रक्षा करें। पर्वत को उठानेवाले एवं सूर्य के समान तेजस्वी हनुमान जी दोनों चरणों की रक्षा करें ॥ १७॥

अत्यंत बलशाली हनुमान जी अंगों तथा पैर की अंगुलियों की सदा रक्षा करें। महाशूर मुख आदि अंगों की तथा मन को वश में रखने वाले रोमवलियों की रक्षा करें ॥ १८॥

वायु-पुत्र कपिश्रेष्‍ठ हनुमानजी दिन रात तीनों लोकों में खड़े, चलते, बैठे, पीते और खाते समय मेरी रक्षा करें ॥ १९॥

मैं सावधान होऊं या असावधान, अथवा गहरे जल में क्यों न सोया होऊं, सब जगह लोकोत्तर गुणशाली शिवपुत्र श्रीमान् हनुमान मेरी रक्षा करें ॥ २०॥

स्थल में, आकाश में, अग्नि में, पर्वत पर, समुद्र में, वृक्षपर, युद्ध में अथवा घोर संकट के समय विराटरूपधारी हनुमान जी मेरी रक्षा करें ॥ २१॥

सोते समय मेरे प्रभु हनुमान जी डाकिनी, शाकिनी, मारी, कालरात्रि, मरीचिका, पिशाच, नाग तथा राक्षसियों को भगाकर मेरी रक्षा करें ॥ २२॥

संपूर्ण प्राणियों के लिए भयंकर तथा श्रेष्‍ठ साधकों के रक्षक दिव्यदेहधारी बुद्धिमान हनुमान जी सदा सब ओर से मेरी रक्षा करें ॥ २३॥

जिनके भीषण रूप को देखकर भयानक जंतु भी भाग खड़े होते हैं, वे सृष्टि, पालन और संहार करने वाले सर्वस्वरुप एवं सर्वज्ञ हनुमान मेरी रक्षा करें ॥ २४॥

जो स्वयं ब्रह्मा, स्वयं विष्‍णु और स्वयं साक्षात महेश्‍वर देव हैं, वे सूर्यमण्‍डल तक पहुंचने वाले लक्ष्‍मीदाता हनुमान तीनों कालों में मेरी रक्षा करें ॥ २५॥

जिनके शब्द को सुनकर दैत्य, दानव तथा राक्षस भयभीत हो जाते हैं और देवता, मनुष्य तथा पशु-पक्षी आदि स्थावर-जङ्गम प्राणी भय से छूटकर अपने-अपने कर्मों में लग जाते हैं तथा प्रत्येक कल्प में जिनकी अनेक पुण्‍य कथाएं सुनी जाती है, वे श्रीरामभक्त हनुमान श्रेष्‍ठ साधक की रक्षा करें ॥ २६-२७ १/2॥

ब्रह्मा और ब्रह्मा की सृष्टि आदि जो कुछ भी संपूर्ण जगत दृष्टिगोचर होता है, उस सबको निरंजन (निर्मल) वानर हनुमान रूप से व्याप्त समझो ॥ २८ १/२॥

जो सर्वव्यापी परमात्मा हैं, वह मैं हूं। यह मैं, मेरा, अपना, मैं स्वयं, अणु, महान ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद सब हनुमानजी के ही रूप हैं। प्रणव तथा त्रिवृत यज्ञ भी वे ही हैं। वे ‘स्व’ रूप तथा ‘सर्व’ रूप हैं। मैं अपने चित को एकाग्र करके उनको नमस्कार करता हूं ॥ २९-३०॥

जो अनेकानेक अनंत ब्रह्माण्‍ड को धारण करते हैं तथा जो ब्रह्मस्वरुप, वायुपुत्र और आत्मस्वरुप हैं, उन हनुमानजी को मैं नमन करता हूं ॥ ३१॥

उन हनुमान जी को नमस्कार है, वायुपुत्र को नमस्कार है, श्रीरामभक्त को नमस्कार है तथा महान श्‍यामस्वरुप को नमस्कार है॥ ३२॥

जो सुग्रीव की श्रीराम के साथ मैत्री कराने वाले, लंकापुरी को दग्ध करने वाले तथा महासागर को लांघ जाने वाले हैं. उन वानरवीर को नमस्कार है ॥ ३३॥

जो सीता जी के शोक का विनाश करने वाले, श्रीराम की दी हुई मुद्रिका को धारण करने वाले तथा रावण के विनाश के आदि कारण हैं, उन सर्वोत्तरात्मा (लोकोत्तर वीर) श्री हनुमान जी को नमस्कार है ॥ ३४॥

मेघनाद के यज्ञ का विध्‍वंस करने वाले, अशोक वाटिका को नष्‍ट-भ्रष्‍ट कर देने वाले तथा विजयप्रदाता हनुमानजी को बारंबार नमस्कार है ॥ ३५॥

जो आकाश के भीतर चलने वाले, (अशोक) वनरक्षकों के मस्तक का छेदन और लंका के महलों का भंजन करने वाले, तपाये हुए सुवर्ण के समान कांतिमान, लंबी लांगूल धारण करनेवाले तथा सुमित्राकुमार को विजय दिलाने वाले हैं, उन वीरवर वायुपुत्र श्रीरामदूत को नमस्कार है।

जो रावण कुमार अक्षय का वध करनेवाले, मेघनाद के ब्रह्मास्त्र का निवारण कर देने वाले, लक्ष्‍मण के शरीर में महाशक्तिजनित घाव का विनाश करने वाले, राक्षसों के हंता, शत्रुओं के नाशक और भूतों के विघातक तथा रीछों और वानरवीरों के समुदाय को प्रसन्न करनेवाले हैं, उन पवननंदन को बारंबार नमस्कार है ॥ ३८-३९॥

शत्रु सैन्य-बल के नाशक और शस्त्र तथा अस्त्रों के विनाशक आपको नमस्कार है। विष-नाशक, शत्रु-नाशक और भय-नाशक आपको बारंबार नमस्कार है ॥ ४०॥

आप बड़े-बड़े शत्रुओं के भय को मिटाने वाले तथा भक्तों के एकमात्र रक्षक हैं। शत्रुओं द्वारा प्रयुक्त यंत्र-मंत्रों का स्तम्भन (रुकावट) करने वाले, पानी पर पत्थर को तैरानेवाले, प्रात:कालीन बाल-सूर्य के मण्‍डल को अपना ग्रास बनानेवाले तथा सबके दु:ख हर लेने वाले आप हनुमान को बारंबार नमस्कार है ॥ ४१-४२॥

नख ही आपके आयुध हैं। आप देखने में भयंकर तथा दांतों को भी आयुध के रूप में धारण करते हैं। आप आकाशचारी, शिवस्वरुप तथा व्रजदेहधारी हैं। आपको नमस्कार है ॥ ४३॥

आप प्रत्येक ग्राम में स्थित हैं, भूतों और प्रेतों का वध करे के लिए उद्यत रहते हैं। आपके एक हाथ में शस्त्र रूप में पर्वत है तथा आप श्रीराम के वाण हैं। आपको नमस्कार है॥ ४४॥

आप कौपीन वस्त्रधारी तथा श्रीराम भक्ति में तत्पर रहने वाले हैं। आप दक्षिण दिशा के सूर्य तथा सत्पुरुषों के लिए चंद्रोदय रूप हैं। आप कृत्याजनित क्षति एवं व्यथा के नाशक तथा संपूर्ण क्लेशों का हरण करले वाले हैं। स्वामी की आज्ञा से पृथापुत्र अर्जुन को महाभारत युद्ध में सहायता देने एवं विजय दिलाने वाले हैं। आप दिव्य वादों तथा संग्राम में भक्तों को विजय दिलाने वाले, किलकिला एवं बुबुकार करने वाले तथा भयंकर सिंहनाद करने वाले हैं। आप संपूर्ण अग्नि एवं व्याधियों का स्तंभन करने वाले तथा भय हरने वाले हैं। विशेषत: आप सदा वन्य फलों के आहार से ही पूर्णत: तृप्त रहते हैं। महासागर में पत्थरों का सेतु बांधनेवाले आपको नमस्कार है ॥ ४५-४८ १/२ ॥

ब्रह्मन! यह मैंने कल्याणमय मारुति-कवच का वर्णन किया है। जिस किसी को भी इसका उपदेश नहीं देना चाहिए। प्रयत्नपूर्वक इसकी रक्षा करनी चाहिए ॥ ४९ १/२॥

जो इस कवच को अष्‍टगंध से लिखकर कण्‍ठ अथवा दाहिनी बांह में धारण करता है, उसे पद-पद पर विजय प्राप्त होती है ॥ ५० १/२॥

बहुत कहने से क्या लाभ। यदि आदरपूर्वक लाख बार पाठ करके इसको सिद्ध कर लिया जाय तो इस कवच का जप असाध्‍य कार्य को भी सिद्ध कर सकता है ॥ ५१-५२ ॥

इस प्रकार श्रीबृहन्नारदीयपुराण के पूर्वभाग में बृहदुपाख्यान के तृतीयपाद में मारुति-कवच निरूपण का अठहत्तरवां अध्याय समाप्त हुआ ।।

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