vedsar shiv stav stotra

वेदसार शिव स्तव स्तोत्र | Vedsar Shiv Stav Lyrics in Sanskrit, Hindi

वेदसार शिव स्तव स्तोत्र Vedsar Shiv Stav भगवान आदि शंकराचार्य द्वारा रचित भगवान शिव को समर्पित एक प्रभावशाली और बड़ी सुंदर स्तुति है । इसके पाठ से सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। इस स्तोत्र में आदि शंकराचार्य जी ने भगवान उमापति शंकर के वेदों में वर्णित स्वरूप का बड़ा सुंदर वर्णन किया है। इसके पाठ से मनुष्य के पापों का नाश होता है तथा परम ज्ञान की प्राप्ति होती है ।

इस स्तोत्र की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें शिव को साकार और निराकार (जो पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से भी परे हैं) दोनों रूपों में पूजा गया है।

इस स्तोत्र में ग्यारह श्लोक हैं। प्रथम नौ श्लोक भुजंगप्रयात छन्द में निबद्ध हैं तथा अन्तिम दो श्लोक रुद्र वसन्ततिलका में हैं। ये ग्यारह श्लोक एकादश रुद्र के प्रतीक हैं।
भगवान् शंकर की ग्यारह मूर्तियाँ रुद्र हैं। ये हमारी ज्ञानेन्द्रियों का – आँख, कान, नाक, जीभ, स्पर्श का तथा कर्मेन्द्रियों का अर्थात् वाणी, हाथ, पैर, मल व मूत्र त्यागने की इन्द्रियों का व मन बुद्धि अन्तः इन्द्रियों का प्रतीक हैं। मन हृदय में रहते हुए इच्छा करता है, बुद्धि मस्तिष्क में रहते हुए निश्चय करती है। ज्ञानेन्द्रियाँ ज्ञान कराने वाली और कर्मेन्द्रियाँ कर्म कराने वाली होती हैं।

वेदसार शिव स्तव Vedsar Shiv Stav – जैसा कि नाम से ही पता चल रहा है कि ये वेदों में जो शिव तत्व है उसका ‘सम्पूर्ण सार’ आदि शंकराचार्य जी ने इस स्तोत्र के माध्यम से प्रस्तुत किया है । इसके पाठ से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं ।

अथ श्री वेदसार शिव स्तव स्तोत्र Vedsar Shiv Stav

पशूनां पतिं पापनाशं परेशं, 
गजेन्द्रस्य कृत्तिं वसानं वरेण्यम्।
जटाजूटमध्ये स्फुरद्गाङ्गवारि,
महादेवमेकं स्मरामि स्मरारिम् ॥ १॥
महेशं सुरेशं सुरारार्तिनाशं,
विभुं विश्वनाथं विभूत्यङ्गभूषम् ।
विरूपाक्षमिन्द्वर्कवह्नित्रिनेत्रं,
सदानन्दमीडे प्रभुं पञ्चवक्त्रम् ॥ २॥
गिरीशं गणेशं गले नीलवर्णं,
गवेन्द्राधिरूढं गणातीतरूपम् ।
भवं भास्वरं भस्मना भूषिताङ्गं,
भवानीकलत्रं भजे पञ्चवक्त्रम् ॥ ३॥
शिवाकान्त शम्भो शशाङ्कार्धमौले,
महेशान शूलिन् जटाजूटधारिन् ।
त्वमेको जगद्व्यापको विश्वरूप
प्रसीद प्रसीद प्रभो पूर्णरूप ॥ ४॥
परात्मानमेकं जगद्बीजमाद्यं
निरीहं निराकारमोङ्कारवेद्यम्।
यतो जायते पाल्यते येन विश्वं
तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम्।
॥ ५ ॥
न भूमिर्न चापो न वह्निर्न वायुर्न,
चाकाशमास्ते न तन्द्रा न निद्रा ।
न ग्रीष्मो न शीतं न देशो न वेषो,
न यस्यास्ति मूर्तिस्त्रिमूर्तिं तमीडे ॥ ६ ॥
अजं शाश्वतं कारणं कारणानां,
शिवं केवलं भासकं भासकानाम् ।
तुरीयं तमः पारमाद्यन्तहीनं
प्रपद्ये परं पावनं द्वैतहीनम् ॥ ७ ॥
नमस्ते नमस्ते विभो विश्वमूर्ते
नमस्ते नमस्ते चिदानन्दमूर्ते ।
नमस्ते नमस्ते तपोयोगगम्य
नमस्ते नमस्ते श्रुतिज्ञानगम्य ॥ ८ ॥
प्रभो शूलपाणे विभो विश्वनाथ
महादेव शम्भो महेश त्रिनेत्र |
शिवाकान्त शान्त स्मरारे पुरारे
त्वदन्यो वरेण्यो न मान्यो न गण्यः ॥ ९ ॥
शम्भो महेश करुणामय शूलपाणे
गौरीपते पशुपते पशुपाशनाशिन् ।
काशीपते करुणया जगदेतदेक-
स्त्वं हंसि पासि विदधासि महेश्वरोऽसि ॥ १० ॥
त्वत्तो जगद्भवति देव भव स्मरारे
त्वय्येव तिष्ठति जगन्मृड विश्वनाथ |
त्वय्येव गच्छति लयं जगदेतदीश
लिङ्गात्मकं हर चराचरविश्वरूपिन् ॥ ११ ॥

वेदसार शिव स्तव स्तोत्र पाठ के लाभ (Vedasar Shiv Stav Benefits )

इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतो वेदसारशिवस्तवः सम्पूर्णः

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